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शुक्रवार, 13 मई 2022

मई 13, 2022

ईश्वर को ख़ुद को समर्पित कीजिए फिर अपनी जिंदगी में चमत्कार देखिए।

 हरे कृष्णा दोस्तों,


दोस्तों, सुख और दुख हर मनुष्य के जीवन का हिस्सा है। कई बार यह दुख की घड़ी इतनी लंबी और कष्टदायक होती है। कि हमारा उससे बाहर निकलना असंभव सा लगने लगता है। दुख हमें चारों ओर से घेर लेता है। और आशा की कोई किरण नजर नहीं आती। हम पूरी तरह से अंदर से टूट चुके होते हैं। दुख की इस घड़ी में हमारे अपने भी हमारा साथ छोड़ देते हैं। निराशा और अवसाद से घिर हम खुद को भी असमर्थ महसूस करने लगते हैं। हमें कोई रास्ता नजर नहीं आता और ऐसे में कई बार आत्महत्या करने तक का विचार हमारे मन में आने लगता है। 


दोस्तों यदि आप या आपका कोई मित्र या रिश्तेदार  ऐसी किसी समस्या से जूझ रहे हैं। तो आप यह लेख अंत तक जरूर पढ़े। और जरूरतमंद व्यक्ति तक यह लेख अवश्य पहुंचाए। क्योंकि आज जो मैं आपको बताने जा रही हूं। यदि आप उसे ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं। तो मैं यकीन के साथ कह सकती हूं। कि आपकी हर समस्या का समाधान आपको आज ही मिल जाएगा और आप इन दुख तकलीफों से बाहर आ जाएंगे। आपके जीवन में वह चमत्कार घटेगा। जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की। 


दोस्तों, आज मैं आपको कोई काल्पनिक कहानी या यहां वहां से बटोरा हुआ ज्ञान नहीं दे रही हूं। बल्कि अपनी आपबीती बता रही हूं। और ईश्वर के साथ अपना वह अनुभव आपके साथ शेयर कर रही हूं। जिसके बाद से मेरी जिंदगी पूरी तरह बदल गई।


दुख तकलीफ तो मैंने अपने बचपन से देखी। परंतु उन दुख तक़लिफों ने मुझे सिर्फ बाहरी रूप से ही प्रभावित किया। क्योंकि जब अपनों का साथ होता है। और सिर पर माता-पिता का हाथ होता है। तो हम बड़े से बड़े दुख से भी उबर जाते हैं। हुआ भी यही समय के साथ परिस्थितियां ठीक भी हो गई। सब कुछ अच्छा चलने लग गया। पर नहीं पता था। कि यह अच्छा समय अधिक समय के लिए नहीं है। नहीं पता था। कि जिंदगी फिर से करवट लेने वाली हैं। फिर से दुख तकलीफों का पहाड़ मेरे ऊपर टूटने वाला है। परंतु इस बार जो दुख मेरे जीवन में आए। उन्होंने सिर्फ बाहरी रूप से ही, मेरे जीवन में उथल-पुथल नहीं मचाई। अपितु मुझे अंदरूनी रूप से भी पूरी तरह तोड़ दिया। क्योंकि शादी के बाद मेरे अपनों ने भी मुझे पराया मान इस दुख की घड़ी में मेरा साथ छोड़ दिया। और जिनको मैंने अपना माना वो अपने भी मेरे विरुद्ध खड़े हो गए। 


जीवन इस मोड़ पर आ गया। जहां जिंदगी भी जहन्नुम बन गई। जहां दिन का चैन सुकून और  रातों की नींद तक छिन गई। दुख और अवसादों से घिर मैने 12 सालों तक नींद और डिप्रेशन की दवाइयां खाई। ना ही शारीरिक स्थिति अच्छी थी। ना ही मानसिक स्थिति और ना ही आर्थिक स्थिति। और ना ही रिश्तो में प्यार और सम्मान। अपनी जिंदगी के 14 साल बद से भी बदतर हालातों में निकालें। लाख कोशिशों के बाद ना आसपास के लोग बदले। ना माहौल बदला। और ना ही परिस्थितियां बदली। और एक समय बाद कोशिश करते करते मैं थक गई। अब लगने लगा। कि कुछ भी नहीं बदलने वाला। आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी। बार-बार आत्महत्या करने के विचार मन में आते। कि ऐसी जिंदगी से तो मौत ही अच्छी।



एक बार की बात है। नींद की गोली खाने पर भी जब मुझे नींद नहीं आ रही थी। तो में मोबाइल में नींद के उपाय देखने लगी। तब मुझे यूट्यूब पर संजीव मलिक जी की योग निद्रा की एक वीडियो मिली। मुझे काफी अच्छा लगा। और इस तरह मैं उनके चैनल से जुड़ी। उनकी meditation और positive affirmations वाली वीडियो भी देखी। और  meditation वगैरह आदि शुरू किया। जिससे मुझे मेरी सेहत में भी काफी अच्छा रिजल्ट मिला। बाहर की परिस्थितियां तो नहीं बदली थी। परंतु मेरे मन की स्थिति काफी हद तक बदल गई थी। अब मुझे फर्क नहीं पड़ रहा था। कि मेरे आस-पास क्या घट रहा है। कौन मुझे ताना दे रहा है। कौन मेरे बारे में गलत बोल रहा है। मैंने अंदर से खुद को काफी मजबूत बना लिया। अब किसी का भी गलत व्यवहार मुझे दुखी नहीं कर पा रहा था। परिस्थितियां मेरे बस में नहीं थी। ना ही लोगों की सोच या व्यवहार। परंतु मेरा व्यवहार, मेरी सोच, मेरा व्यक्तित्व, मेरे कर्म, यह सब मेरे बस में थे। मैंने खुद पर बहुत काम किया अपनी सोच को बहुत सकारात्मक बनाया। करीब 1 साल में, मैं depression से बाहर आ गई। मेरी नींद की गोलियों की लत भी छूट गई। 


परिस्थितियां नहीं बदली। परंतु मैं पूरी तरह बदल चुकी थी। इस बीच ईश्वर के प्रति मेरी श्रद्धा, मेरी आस्था और भी गहरी होती चली गई। ईश्वर के नाम के सहारे दुख की घड़ी भी हंसते हुए गुजार दी। इस विश्वास के साथ एक दिन सब ठीक हो जाएगा। 


हालांकि मैंने खुद को पूरी तरह बदल लिया था। और हर हाल में खुश रहना सीख लिया था। फिर भी कहीं ना कहीं मन में यह चिंता सताती थी। की ऐसी परिस्थितियों में मुझे कब तक रहना पड़ेगा। आखिर यह परिस्थितियां कब और कैसे बदलेगी। और मुझे कोई रास्ता ना सूझता।


इसी बीच मैंने संजीव मलिक जी की एक वीडियो और देखी। जिसमें वे बता रहे थे। कि किस तरह समर्पण का रास्ता अपनाकर ईश्वर से जुड़ा जा सकता है। और जब हम ख़ुद को, ईश्वर के प्रति समर्पित करते हैं। तो हमारी सारी समस्याओं को वह सुलझा देता है।


और उन्होंने उस वीडियो में बताया कि किस तरह कृष्ण ने अर्जुन को समर्पण का रास्ता बताया।


गीता ज्ञान देते हुए श्री कृष्ण कहते हैं। जब कोई रास्ता ना दिखे। तो तू मेरी शरण में आ जाना। और खुद को अपनी सभी चिंताओं सहित मुझे समर्पित कर देना।


और मैने उस परमपिता परमात्मा से जुड़ने के लिए प्रेम और समर्पण का रास्ता अपनाया। 


ईश्वर को खुद को समर्पित करने के बाद मेरी परिस्थितियां बदलने लगी। और मैं अपने जीवन की सभी चिंताओं से मुक्त हो गई। और जहां मुझे जीवन में कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था। वह मुझे अपने जीवन का उद्देश्य समझ में आया और उस दिशा में, मैं अपना कार्य करने लगी।
















आज मैं अपनी सभी समस्याओं के हल सीधा परमात्मा से पाती हूं। अपने जीवन का हर बड़ा फैसला उनके मार्गदर्शन में ही करती हूं। इसे ईश्वर का चमत्कार नहीं तो और क्या कहेंगे? जो कुछ समय पहले खुद अंधेरे में थी। depression में थी। नींद की गोलियां खा रही थी। जिंदगी से निराश थी। जिसे कोई रास्ता समझ नहीं आ रहा था। जो अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी। हार चुकी थी। आज वहीं लोगों के जीवन में एक उम्मीद की किरण जगा रही है। लोगों को motivation दे रही है।
















दोस्तों यदि आप जानना चाहते हैं। कि ईश्वर के प्रति समर्पण कैसे करें? ईश्वर, एंजल्स, आपके इष्ट, देवी देवता या आप जिसे भी मानते हैं। उनसे कैसे कनेक्ट करें? अपनी सभी समस्याओं का हल उनसे कैसे पाएं? तो आप comment box में लिखकर जरूर बताएं। इसके लिए मैं अलग से post डाल  दूंगी।



दोस्तों यदि आपको मेरी यह post अच्छी लगी। तो आप इसे आगे भी शेयर करें। दोस्तों मेरे काम को सरहाने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया। आशा करती हूं। आपका और हमारा यह स्नेह पूर्ण संबन्ध सदा बना रहेगा। नीचे दी गई red line पर touch करके आप मुझे youtube, Instagram page और facebook page पर भी follow कर सकते हैं।



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धन्यवाद्।


राधे राधे।


रविवार, 8 मई 2022

मई 08, 2022

माँ तुम्हारे एहसासों को मैं तब समझी जब मैं खुद माँ बनी।


हरे कृष्णा दोस्तों,


दोस्तों, आज मातृ दिवस के अवसर पर मैं आपको बहुत प्यारी सी कहानी सुना रही हूं।
















एक बार की बात है। ईश्वर कुछ गढ़ रहे थे। एक अप्सरा वहां से गुजरी और उसने ईश्वर से पूछा यह आप क्या बना रहे हैं? मैं आपको लगातार 6 दिन से काम करते देख रही हूं। ईश्वर ने जवाब दिया। मैं "मां" को गढ़ रहा हूं। अप्सरा की जिज्ञासा थी। कैसी बनानी है "मां" ?



ईश्वर ने उत्तर दिया।



जिसकी कोख से मानवता जन्मे....


जिसकी गोद में सृष्टि समा जाए....


जिसका स्पर्श बड़ी से बड़ी चोट को सहला कर ठीक कर दे....


जिसका दुलार बड़े से बड़े सदमे से उबार दें....


जिसके दो हाथ सबको दिखे, पर हो कई....


ताकि जीवन संवारने का उसका कर्तव्य,


बिना बाधा पूरा हो सके......


जिसके मन में भी आंखें हो। जिससे वह,


दूर बैठी अपनी संतान को देख सके..... 


जो बीमार होने पर भी 10 लोगों वाले 


परिवार के लिए हंसकर भोजन बना दे..... 


नाजुक हो पर हर मुश्किल को,


हरा सकने का दम रखें..... 


जिसके आंचल तले सृष्टि को सुरक्षा मिले....


जिस के नेत्रों में अपने बच्चों के लिए,


भाव भरा जल हो, और उनके शत्रुओं के लिए ज्वाला.....


जिसके दर्शन मात्र से मानवता कृत कृत हो जाए...


मैं उसे गढ़ रहा हूं। जिसे मानव ठेस तो बहुत पहुंचाएगा.....


पर उसका हाथ ना आशीर्वाद देने से रुकेगा और ना दिल दुआ मांगने से....




बहुत पहले यह लेख किसी news paper में पढ़ा बहुत अच्छा लगा। जिसे मैंने अपनी डायरी में सहेज कर रख लिया। और आज आप लोगों के साथ शेयर किया।


कुछ जज़्बात दूसरों के और कुछ अपने मिलाकर एक नया flavour आप लोगों को परोस रही हूं। आशा है। आप लोगों को पसंद आएगा।


किसी ने बिल्कुल सही कहा है। कि दुनिया के हर रिश्ते के प्यार को यदि कंपेयर किया जाए। तो "मां" का प्यार हर रिश्ते से 9 महीने ज्यादा ही निकलेगा।

एक "मां" ही है। जो अपनी संतान के दुनिया में आने से पहले ही और उसे बिना देखे ही उस से प्रेम करने लग जाती है।


जब अपने बच्चे को जन्म लेने के बाद मैंने पहली बार उसे गोद में लिया। तब समझ में आया। कि मां बनने का क्या एहसास होता है? कि कैसे एक मां अपने  बच्चे के मासूम से चेहरे को देखकर उस असहनीय पीड़ा को भूल जाती है। जिससे वह कुछ पल पहले ही गुजरी। 


यह समझ आया। कि क्यों "मां" को ईश्वर का दर्जा दिया जाता है। क्योंकि जीवन देने वाला ईश्वर है। तो उस जीवन को जन्म देने वाली मां ही होती है।


यह समझ आया। कि क्यों "मां" ईश्वर के समान सम्माननीय है। क्योंकि अपनी संतान को जन्म देने के लिए वह कैसे अपनी जान को दांव पर लगा देती है। क्योंकि जब वो प्रसव पीड़ा में होती है। तब उसका एक पैर जिंदगी की दहलीज पर तो दूसरा पैर मौत की दहलीज पर रखा होता है। इसका कोई भरोसा नहीं होता। कि उसका नसीब किस ओर उसे ले जाएं। 


यह सत्य घटना है। जहां मैं अपने बच्चे के आने की खुशी मना रही थी। वही पास वाले वार्ड में रोने धोने की आवाज आ रही थी। और मुझे पता चला। की शादी के 2 साल ही हुए थे। पहला बच्चा था। वे लोग एक दूसरे हॉस्पिटल से रेफर किए हुए थे। उस हॉस्पिटल से इस हॉस्पिटल तक लाने के रास्ते में ही बच्चेदानी फट गई। और बच्चें को जन्म देने से पहले ही वह मर गई। और ऑपरेशन कर बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। 


हमारा यह जीवन पहला उस ईश्वर तो दूसरा उस "मां" की देन है। जिसने हमें जन्म दिया। इसलिए हमें सदा उनका शुक्रिया मानना चाहिए।


एक "मां" अपने बच्चें के लिए सिर्फ प्रसव पीड़ा ही नहीं सहती अपितु अपने बच्चें के जन्म लेने से पहले और उसके जन्म लेने के बाद भी ना जाने कितनी तकलीफों से गुजरती है। कितने ही शारीरिक और मानसिक बदलावों से गुजरती है। बच्चें को सुलाने की खातिर वह खुद रातों को जागती है।



सिर्फ नींद ही नहीं ना जाने कितने ख्वाब उसके अधूरे रह जाते हैं। दिन रात वो अपने बच्चें की सेवा में लग जाती है। वो खुद की पहचान बनाना भूल जाती है। जब एक स्त्री "मां" बन जाती है। अपने बच्चें की खातिर ना जाने क्या-क्या कुर्बान कर जाती है। जब एक स्त्री "मां" बन जाती है। उसके समर्पण का कर्ज़ जिंदगी भर नहीं चुकाया जा सकता।



"मां" तुम्हारी दुख तकलीफों को, तुम्हारी पीड़ा को तुम्हारे संघर्ष को, तुम्हारे समर्पण को और तुम्हारे एहसासों को मैं तब समझी जब मैं खुद ना बनी।


और इन सबके बदले मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकती सिवाय प्रेम और सम्मान के। और इन सब के लिए तुम्हारा तहे दिल से शुक्रिया करती हूं। और यह लेख व अपने हृदय की यह भावनाएं तुम्हें समर्पित करती हूं।



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राधे राधे




शनिवार, 7 मई 2022

मई 07, 2022

Law of attraction v/s surrender












हरे कृष्णा दोस्तों,



दोस्तों, "Law of attraction" अर्थात इस universe के आगे, ईश्वर के आगे हम अपनी demand  रखते हैं। कि हमें फलाना फलाना चीज चाहिए। हम उसे बार बार दोहराते हैं। visualise करते हैं। manifest  करते हैं। 


जब हम उस चीज के प्रति प्रयासरत होते हैं। उसके काबिल होते हैं। तो वह चीज हमें मिल भी जाती है।


Surrender - ( समर्पण )


"समर्पण" जहां ईश्वर से कुछ मांगा नहीं जाता। सब कुछ ईश्वर पर ही छोड़ दिया जाता है। वो जो भी दे दे। उसे खुशी-खुशी स्वीकार किया जाता है। जहां लोभ, लालच,अहंकार सब को त्याग कर खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देना होता है।


जहां मन में यह समर्पण भाव उठे


"हे ईश्वर मैं भी तेरी।

मेरी यह जिंदगी भी तेरी।

मेरी हस्ती को मिटा दे। या बना दें।

जैसी भी हो रज़ा तेरी।

तेरी दी हर चीज मंजूर है मुझे।

तू सुख दे या दुख दे, यह मर्जी तेरी।"




जब हम उसके हो जाते हैं। खुद को उसके प्रति समर्पित कर देते हैं। तो उसकी रजा में ही हमें मजा आने लगता है। जीवन में बड़े से बड़ा दुख आने पर भी हम उस पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते? कि मेरे ही साथ ऐसा क्यों?


इस भाव के साथ उस पर पूर्ण विश्वास रखते हैं। कि वह जो करता है। हमारे लिए अच्छा ही करता है। इसमें हमारा ही भला छुपा होता है। यदि उसने हमें कड़वी दवा पिलाई है। तो कहीं ना कहीं हमारी किसी बीमारी को ही वहां ठीक कर रहा है। 



समर्पण अर्थात ईश्वर से कुछ मांगा नहीं जाता। ईश्वर या इस यूनिवर्स के आगे अपनी कोई मांग नहीं रखना है। 























दोस्तों महाभारत का एक वाक्या है। जो आप सभी ने सुना ही होगा। जिसमें अर्जुन और दुर्योधन श्री कृष्ण के आगे अपनी मांग रखते हैं। तब दुर्योधन श्री कृष्ण से पूरी नारायणी सेना मांग लेता है। और जब अर्जुन की बारी आती है। तब अर्जुन श्री कृष्ण से कहता है। की हे कृष्ण मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस आप मेरे साथ रहे। आप मेरी तरफ रहे। मुझे सिर्फ आप ही चाहिए। और आपका मार्गदर्शन चाहिए। 



उस समय भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन की चुटकी (मजाक) लेते हुए कहा।



"हार निश्चित है। तेरी,

हरदम रहेगा उदास।

माखन दुर्योधन ले गया।

केवल छाछ बची तेरे पास।"


अर्जुन ने इसके जवाब में कहा-


"हे प्रभु जीत निश्चित है। मेरी,

दास हो नहीं सकता उदास।

माखन लेकर क्या करूं?

जब माखन चोर है मेरे पास।"




उनसे कुछ मांगना ही है। तो बस उनसे उन्हें ही मांगना, उनका प्रेम मांगना, उनका मार्गदर्शन मांगना। उनका साथ मांगना। कि हे ईश्वर जीवन की इस मुश्किल डगर में आप मेरा हाथ थामे रखना। 


यह बात तो सभी जानते हैं। कि जिसके साथ ईश्वर है। उसकी अंत में जीत निश्चित है।


समर्पण वही कर पाता है। जो ईश्वर से निस्वार्थ प्रेम करता है।


जहां ईश्वर से कोई business deal नहीं होती। कि मेरा फलाना काम हो जाए। मैं इतने व्रत रखूंगी। मेरा यह काम हो जाए। मैं गोवर्धन की परिक्रमा लगाऊंगा। यहां में कुछ कड़वे शब्दों का प्रयोग कर रही हूं। शायद कुछ भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुंचे। पर इसे  business deal नहीं तो और क्या कहेंगे? जहां एक लोटा जल या दूध के बदले ईश्वर से ना जाने क्या-क्या मांगा जाता है। गर हमारा स्वार्थ ना हो तो हम उसे दो अगरबत्ती भी ना लगाएं। हम उसके दर पर हमेशा कुछ ना कुछ मांगने ही तो जाते हैं।


बिजनेस और निस्वार्थ प्रेम दोनों एक दूसरे के विरुद्ध है। जहां बिजनेस होता है। वहां प्रेम नहीं हो सकता और जहां प्रेम होता है। वह बिजनेस नहीं हो सकता।

ईश्वर से निस्वार्थ प्रेम कीजिए। उसकी निस्वार्थ सेवा कीजिए। उसे जो भी देना है। निस्वार्थ भाव से दीजिए। फिर देखना वहां खुश होकर हमें क्या-क्या नहीं दे देगा।


इस बात पर एक वाक्या मैं आपको सुनाती हूं।


सुदामा के जीवन का बहुत कष्ट दाई समय चल रहा था। तन पर पर्याप्त कपड़े नहीं थे। और दो वक्त का भोजन भी नसीब नहीं हो रहा था। तब सुदामा की पत्नी सुदामा से कहती है। कि तुम्हारे मित्र तो इतने धनवान है। उनके पास जाओ। अपने मित्र से मदद मांगना। वे अवश्य तुम्हारी मदद करेंगे।



















और पत्नी के कहने पर सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण से मिलने द्वारका के लिए निकल पड़ते हैं। और अपने सामर्थ्य अनुसार एक मुट्ठी चावल भेंट स्वरूप मित्र को देने के लिए अपने पास रख लेते हैं। और जब वे द्वारिका पहुंचते हैं। तब श्री कृष्ण को संदेश मिलता है। कि उनके मित्र सुदामा उन्हें मिलने आए हैं। तब श्री कृष्ण दौड़ते हुए अपने मित्र से मिलने आते हैं। और उन्हें गले लगा लेते हैं। और बड़ी ही दरियादिली से अपने मित्र की आवभगत करते हैं। उनके चरणों को धोते हैं। और इस अपार प्रेम, सम्मान और सेवा के आगे सुदामा अपनी छोटी सी मांग को रखना अनुचित समझते हैं। बिना मांगे ही रह जाते हैं। और जिस भेंट के बदले में वे कृष्ण से कुछ स्वर्ण मुद्राएं मदद स्वरूप मांगने वाले थे। वे नहीं मांगते। और अपने मित्र से कहते हैं। कि तुमने मुझे इतना प्रेम और सम्मान दिया। उसके बदले में मैं बहुत ही तुच्छ सी भेंट तुम्हारे लिए लाया हूं। अपनी पोटली के एक मुट्ठी चावल निस्वार्थ भाव से उन्हें दे देते हैं। और बिना कुछ मांगे ही द्वारिका से चले जाते हैं।


जब सुदामा अपने गांव पहुंचते हैं। तो देख कर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। उसकी टूटी फूटी झोपड़ी की जगह बहुत ही सुंदर सा महल खड़ा होता है। उसके बच्चे सुंदर सुंदर वस्त्र पहने होते हैं। उसकी पत्नी सुंदर वस्त्र और महंगे महंगे रत्न जड़ित स्वर्ण आभूषण पहनी होती है।


सुदामा अपनी पत्नी से पूछते हैं। तो उनकी पत्नी कहती है। कि तुम्हारे मित्र श्री कृष्ण की कृपा से ही यह सब हमें मिला है।


दोस्तों सोचिए अगर सुदामा ने अपने मित्र श्री कृष्ण से कुछ मांगा होता। उनके आगे अपनी कुछ मांग रखी होती। तो वह कुछ स्वर्ण मुद्रा ही पाते।


क्योंकि जब हम कुछ मांगते हैं। तो अपनी औकात के अनुसार ही मांग पाते हैं। और जब वह हमें बिना मांगे ही कुछ देता है। तो अपनी औकात के अनुसार देता है।

और ईश्वर की औकात क्या है? इसका आंकलन करना हमारी औकात के बाहर है।


ईश्वर से भला क्या मांगना? वह तो सब जानता है। कि तुम्हारे जीवन में किस चीज की कमी है।


कुछ पाने के लिए नहीं। निस्वार्थ भाव से उसकी सेवा करो, सत्कर्म करो। उसके प्रेम के, उसकी दया के, उसकी कृपा के काबिल बनो।


यदि निस्वार्थ भाव से हमने मुट्ठी भर भी उसे कुछ समर्पित किया। तो वहां खुश होकर हमें मुट्ठी भर भी दे दे। तो हमारे पास इतना होगा। जो हमसे संभाले भी नहीं संभलेगा। उसकी मुट्ठी तो आप समझ ही सकते हो कितनी बड़ी है। उसमें कितना कुछ समा सकता है। जब उसकी कृपा होती है। तो बिना मांगे भी इतना मिल जाता है। जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।


दोस्तों समर्पण भाव को दर्शाती एक भजन की कुछ लाइनें मैं यह पर लिख रही हूं। अगर यह आपके हृदय को छूती हैं तो आप समर्पण भाव को समझ सकते हैं।


तुम्हारे सिवा ना कोई चाहत करेंगे।

जब तक जीयेंगे, इबादत करेंगे।-2

नजर चाहती है। दीदार करना।

ये दिल चाहता है। तुम्हें प्यार करना।-2

तेरे श्री चरणों के पास जब जाए।

मस्ती इलाही में दिल झूम जाए।-2

सदा ही मिले बस प्यार तुम्हारा।

इसे हम अपनी खुशकिस्मत कहेंगे।-2

तुम्हारे सिवा ना कोई चाहत करेंगे।

कि जब तक जिएंगे इबादत करेंगे।-2




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भगवान भरोसे होने का अर्थ


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राधे राधे



गुरुवार, 24 मार्च 2022

मार्च 24, 2022

भगवान भरोसे होने का अर्थ।












हरे कृष्णा दोस्तों,



दोस्तों, जब परिस्थितियां खराब होती है। तो कई बार हमने अपने बड़े बुजुर्गों के मुंह से सुना है। कि चिंता मत करो। सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दो। सब ठीक हो जाएगा। और कई लोग इस वाक्य का गलत मतलब निकाल लेते हैं। और कुछ कर्म ही नहीं करते और बिना कर्म के ही सोचते हैं। कि परिस्थितियां स्वत: ठीक हो जाएंगी। दोस्तों इस बात पर आज मैं आपको एक कहानी सुनाती हूं।



एक आदमी की आर्थिक स्थिति बहुत खराब होती है। वह अपनी टूटी फूटी झोपड़ी में जैसे तैसे दिन बिता रहा था। उसकी पत्नी लोगों के घरों में जाकर खाना बनाने का काम करती हैं। और उसी आय से अपने परिवार का भरण पोषण करती है। और अपने पति को समझाती है। कि तुम भी कुछ काम करो। ताकि हमारे दिन बदल सके। हमारी आर्थिक स्थिति थोड़ी सुधर सके। परंतु पति बोलता है। इन छोटे-मोटे कामों से दिन नहीं बदलने वाले बस हमारा खर्चा पानी ही चलेगा। और मुझे यह छोटे-मोटे काम नहीं करना। मुझे तो बहुत अमीर बनना है। और वह अमीर बनने के लिए जुगाड़ लगाने लग जाता है। वह अपनी पत्नी की कमाई में से कुछ पैसे लेकर लॉटरी के टिकट खरीदता है। और भगवान की मूर्ति के आगे रख देता है। 

















और सुबह शाम भगवान से प्रार्थना करता है। कि हे! ईश्वर कुछ ऐसा चमत्कार करो। कि मेरा यह लॉटरी का टिकट निकल जाए। और इसी तरह भगवान पर भरोसा रख। वह कभी लाटरी का टिकट खरीदता तो कभी जुए में दांव लगाता। और सोचता इस तरह में जल्दी लखपति या करोड़पति बन जाऊंगा।




अपनी पत्नी की मेहनत की कमाई को वह बिना सोचे समझे फिजूल की चीजों में खर्च कर देता। जिसके कारण उसके परिवार की आर्थिक स्थिति और अधिक खराब होती चली गई। पति की इन हरकतों से परेशान हो। वह सोचती है। कि मेरा पति तो निकम्मा है। अब मेरे बच्चों के भविष्य के बारे में मुझे ही सोचना पड़ेगा। और वहां अपने बच्चों को लेकर अपने पति से अलग हो जाती है। उसकी पत्नी भी ईश्वर में बहुत श्रद्धा और विश्वास रखती है। साथ ही यह भी मानती है। ईश्वर भी उसी का ही साथ देता है। जो अपना साथ देता है। जो अच्छी नियत से कर्म करता है। उस पर सदा ईश्वर की कृपा बरसती है। और भगवान पर पूर्ण विश्वास रख। वह एक नए काम की शुरुआत करती है। वह कुछ महिलाओं के साथ एक संस्था का निर्माण करती है। और उसकी संस्था को एक सरकारी स्कूल में मध्यान भोजन वितरण करने का काम मिल जाता है। उसके बेहतर काम और स्वादिष्ट भोजन की चर्चा होने लगती है। और इसी कारण उसे और भी सरकारी स्कूलों में मध्यान भोजन वितरण का काम मिल जाता है। जो लोग अपने कर्म से पीछे नहीं हटते और अपनी मेहनत पर विश्वास रखते हैं। ईश्वर उनके लिए सफलता के कई दरवाजे खोल देते हैं। अपनी मेहनत व ईश्वर की कृपा से वह दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की करती चली जाती हैं। और दूसरी और उसका पति भगवान भरोसे अपनी सारी संपत्ति जुए में दांव पर लगा देता है। और सब कुछ हार जाता है। 




ख़ुद को ईश्वर के भरोसे छोड़ देने का अर्थ यह नहीं कि हम कर्महीन हो जाएं। बल्कि मनुष्य का प्रथम धर्म अपने कर्तव्य का पालन करना है। सत्कर्म करना है। 



भगवान भरोसे रहने का अर्थ प्रयत्न ना करना नहीं है। अपितु प्रयत्न करने के बाद जो भी मिल जाए उसमें प्रसन्न रहना है। लोगों के द्वारा अक्सर भगवान भरोसे रहने का अर्थ अकर्मण्यता को समझ लिया जाता है।



भगवान भरोसे रहने का अर्थ है। कि जो हमारे बस में है। अर्थात हमारे "कर्म" उसे पूरी निष्ठा से किया जाए। और जो हमारे बस में नहीं। अर्थात उस कर्म का प्रतिफल उसे ईश्वर के ऊपर छोड़ दिया जाए।



प्रयत्न करने में, उद्यम करने में, पुरुषार्थ करने में असंतोषी रहो। प्रयास की अंतिम सीमाओं तक जाओ। एक क्षण के लिए भी लक्ष्य को मत भूलो। तुम क्या हो ? यह मुख से मत बोलो लोगों तक तुम्हारी सफलता बोलनी चाहिए।



   "" करने में सावधान होने में प्रसन्न "" 















अच्छी नियत से कर्म करो। बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दो। अच्छी नियत से किए गए सत्कर्म हमेशा अच्छा ही परिणाम देते हैं। हमेशा इस बात के प्रति सचेत रहें। कि कहीं हमारे कर्म किसी का अनिष्ट तो नहीं कर रहे। कहीं हमारे कर्मों द्वारा किसी के हृदय को आघात तो नहीं हो रहा। हमारे मन में सदैव लोगों के कल्याण की भावना होनी चाहिए। और उसी अनुरूप हमारे कर्म होने चाहिए।




कर्म करते समय सब कुछ मुझ पर ही निर्भर है। इस भाव से कर्म करो। कर्म करने के बाद सब कुछ मेरे प्रभु पर ही निर्भर है। इस भाव से शरणागत हो जाओ। परिणाम में जो प्राप्त हो, उसे प्रेम से स्वीकार कर लो।



यदि मैं सीधे-सीधे शब्दों में कहूं। तो भगवान भरोसे होने का अर्थ है। की भगवान पर भरोसा रखना। उन पर पूर्ण विश्वास रखना। और कर्म करने के बाद उसके प्रतिफल को ईश्वर के ऊपर छोड़ देना। की मेरा ईश्वर मुझे जो देगा। उसी में मेरा कल्याण है। इस भाव से खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देना।



🙏🙏 राधे राधे 🙏🙏



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धन्यवाद।


मंगलवार, 25 जनवरी 2022

जनवरी 25, 2022

भरोसा यदि खुद पर हो। तो खुदा भी वही लिखेगा। जो तुम चाहते हों।

प्रस्तावना -  दोस्तों, इस लेख के माध्यम से मैंने आपके आत्मविश्वास को और अधिक मजबूत करने। सफलता पाने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की है। आशा है। आपको यह लेख पसंद आएगा।



"भरोसा यदि खुद पर हो। तो खुदा भी वही लिखेगा। जो तुम चाहते हों।"














हरे कृष्णा दोस्तों,



दोस्तों, आज एक कहानी के माध्यम से मैं अपनी बात आपके समक्ष रख रही हूं। एक आदमी एक दुकान पर जाता है। उस दुकान पर कई रंग बिरंगे पंछी पिंजरे में कैद थे। वह आदमी हर 26 जनवरी के दिन उस दुकान से एक पंछी को खरीद कर उसे आजाद कर हवा में उड़ा देता है। लेकिन वह आदमी पंछी को खरीदने से पहले कम से कम आधे घंटे तक हर पंछी को अच्छे से देखता है। फिर निर्णय लेता है। कि किस पंछी को आजाद करना है। फिर वह कई सारे पंछियों के बीच में से एक पंछी का चयन कर खरीदता है। और फिर उसे आजाद कर देता है। 



दुकान वाले के मन में उत्सुकता जागती है। कि इसे पंछी पालना तो हैं नहीं। फिर इतना समय क्यों लेता है। किसी भी पंछी को तुरंत खरीदें और आजाद कर दे। और उत्सुकतावश वह दुकान वाला उस व्यक्ति से पूछ लेता है। कि आप हर पंछी को इतने ध्यान से क्यों देखते हो। आपको तो पंछी को आजाद ही करना है। फिर उसके चयन में इतना समय क्यों? किसी भी पंछी को खरीद लो क्या फर्क पड़ता है?


















तो वह आदमी दुकान वाले से कहता है। भाई मैं हर पंछी को इसलिए ध्यान से देखता हूं। कि किस पंछी में यह क्षमता है। कि वह ऊंची उड़ान भर सकें। कौन सा पंछी बाहर की चुनौतियों के लिए तैयार है।  किस पंछी के पंख अधिक मजबूत है। और किसे स्वतंत्र होने की और ऊंची उड़ान भरने की प्रबल इच्छा है। 



दुकान वाला पूछता है। कि आप यह कैसे तय करते हैं? कि किसके पंख अधिक मजबूत है। और किसे ऊंची उड़ान भरने की प्रबल इच्छा है। वह व्यक्ति हंसता है। और दुकान वाले से कहता है। मैं यही तो ध्यान से देख रहा था। जहां बहुत सारे पंछी शांत बैठे हुए हैं। कई सारे पंछी अपना भोजन इत्यादि करने में व्यस्त हैं। और कुछ एक दूसरे को चोंच मारने में व्यस्त हैं। 



लेकिन जिसे मैंने खरीदा। वह पंछी आधे घंटे से इस पिंजरे में फड़फड़ा रहा है। वह एक पल के लिए भी शांत नहीं बैठा। ना ही उसका खाने में मन लग रहा था। और ना ही वह दूसरों को चोंच मार रहा था। वह सिर्फ पिंजरे से बाहर निकलने का भरसक प्रयास कर रहा था। उसके उत्साह और पंखों की मजबूती को देखकर मुझे यह समझ आ गया। की यह ऊंची उड़ान भरने की क्षमता रखता है। और इसे स्वतंत्र होने और उड़ान भरने की प्रबल इच्छा है।


दोस्तों, इसी तरह ईश्वर भी चयन करते हैं। हमारे उत्साह, हमारे आत्मविश्वास, हमारे मजबूत इरादे, हमारी संघर्ष करने की क्षमता, हमारा धेर्य, हमारा साहस, हमारी नियत, हमारे कर्म आदि को परख कर। हमें वह अवसर देते हैं। और हमारे लिए तरक्की के दरवाजे खोल देते हैं। ताकि हम अपने जीवन में सफलता की ऊंची उड़ान भर सकें। 




















इसलिए खुद की क्षमताओं को पहचानो। अपने इरादों को मजबूत करो। किसी भी कीमत पर लक्ष्य से ना भटको। ख़ुद को इतना काबिल बनाओ। कि ख़ुद पर और खुद की काबिलियत पर अटूट विश्वास रख सकों। ताकि ईश्वर भी तुम पर विश्वास रख सके। तुम सफल होने के लिए सही रास्ता चुनना फ़िर सफलता के लिए स्वयं ईश्वर तुम्हें चुन लेंगे। सही रास्ते से सफलता जरा देर से मिलती है। लेकिन वह सफलता बहुत बड़ी होती है। उसकी चर्चा सिर्फ गली मोहल्ले में नहीं होती। उस सफलता की चर्चा पूरी दुनिया में होती है। ईश्वर भी उन्हें अवसर देते है। जो उस अवसर के लायक होते हैं।




"लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं? यह विचारणीय नहीं। आप अपने बारे में क्या सोचते हैं? यह महत्वपूर्ण है। स्वयं की क्षमताओं पर, प्रयासों पर और स्वयं पर विश्वास रखो। फिर दुनिया की ऐसी कोई चीज नहीं जो आपको प्राप्त ना हो।"




"भरोसा यदि खुद पर हो। तो खुदा भी वही लिखेगा। जो तुम चाहते हों।"


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राधे राधे।




गुरुवार, 6 जनवरी 2022

जनवरी 06, 2022

कहीं आप भी तो ऐसी चीजों को समर्थन नहीं दे रहे?

प्रस्तावना - दोस्तों यह लेख "कहीं आप भी तो ऐसी चीजों को समर्थन नहीं दे रहे?" मैंने लोगों को जागरूक करने के लिए लिखा है। कि किस तरह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग किया जा रहा है। और हम जाने अनजाने इन चीजों को समर्थन दे रहे हैं














 हरे कृष्णा दोस्तों,


दोस्तों आज मैं बहुत ही गंभीर विषय पर बात करने जा रही हूं। और यह विषय हम सभी की जिंदगी से जुड़ा हुआ है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जहां एक तरफ कई लोगों के लिए वरदान साबित हुआ है। लोगों ने इसका सदुपयोग कर अपने करियर को सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। वहीं सोशल मीडिया का दुरुपयोग भी जोरों शोरों से किया जा रहा है। जैसे कि सोशल मीडिया पर फेमस होने की ऐसी होड़ मची है। कि क्या कर रहे हो? क्यों कर रहे हो? कुछ होश ही नहीं है। कमर मटकाने तक तो ठीक है। अर्धनग्न हालत में इतने बेहूदा तरीके से लोग अपना अगवाड़ा पिछवाड़ा ऐसे मटका रहे हैं। कि देखने वाले को शर्म आ जाए। और इस बेहूदगी को आप टैलेंट कहते हो? नृत्य और अभिनय बहुत ही उच्च कोटि की कला है। और रातों-रात फेमस होने के चक्कर में कई लोगों ने इस कला को मजाक बनाकर रख दिया। तो कई लोग ऐसे वीडियो को बड़े मजे ले ले कर देखते हैं। और ऐसी वीडियो पर लाइक और कमेंट की बाढ़ ला देते हैं। ऐसी बेहूदा चीजों को वायरल कर देते हैं। 













वीडियो छोड़ो social app पर एक लड़की ने अपना स्टाइलिश फोटो डाला और # teg लगा दिया बहुत अकेली हूं। और फोटो के नीचे लाइक और कमेंट की बाढ़ आई हुई थी। किसी ने लिखा था। जानेमन हम हैं ना, तुम्हारा अकेलापन दूर करने के लिए। तो कोई कह रहा था। मेरे पास चले आओ। तो कईयों ने अपने मोबाइल नंबर दे रखे थे। 



फेमस होने के चक्कर में कोई तलवार से अपना बर्थडे केक काट रहा है। तो कोई हवा में फायरिंग कर रहा है। तो कोई चलती हुई बाइक पर अपनी गर्लफ्रेंड को किस कर रहा है। फेमस होने की दौड़ में अंधों की तरह शामिल हो गए है। बिना सोचे समझे कुछ भी किए जा रहे हैं। इस तरह फेमस हो भी गए तो क्या मिल जाएगा। अपने ही बच्चों के लिए आदर्श नहीं बन पाओगे। जिस दिन होश आयेगा। कि तुमने यह क्या किया? उस दिन खुद की ही नजरों में गिर जाओगे। और जो लोग ऐसी व्यर्थ की चीजों को देखने में अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं। उन लोगों का यह मनुष्य जीवन यूं ही व्यर्थ जाने वाला है। क्योंकि जब तक व्यर्थ को नहीं छोड़ोगे तब तक अपने जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। अपने जीवन के उद्देश्य को नहीं जान सकते।


















मैं मुश्किल से 10-15 मिनट के लिए सोशल मीडिया एप्स चलाती हूं। और उस पर भी सकारात्मक चीजें ही देखती हूं। एक पेज का नाम है। सकारात्मकता मुझे लगा उस पर कुछ सकारात्मक ही होगा और मैंने उस वीडियो को देखा। तो मेरा दिमाग ही घूम गया। वीडियो बाहर की कंट्री का था। जिसमें उस देश की कोई सिंगर स्टेज पर गाना गा रही थीं। और हजारों की संख्या में लोग उसे सुन रहे थे। और उन लोगो में से वह एक व्यक्ति को stage पर बुलाती है। स्टेज पर जाकर वह व्यक्ति लेट जाता है। और वह मोहतरमा जो गाना गा रही थी। हजारों पब्लिक के सामने अपनी पेंट उतार कर उस व्यक्ति के मुंह पर अपना यूरिन कर देती हैं। और वह व्यक्ति खुशी-खुशी उसका यूरिन अपने मुंह में ले लेता है। क्योंकि वह उसका बहुत बड़ा फैन है। और वहां मौजूद सभी व्यक्ति यह seen देखकर तालियां बजा रहे हैं। यह वीडियो वायरल है। क्योंकि लोग ऐसी चीजों को पसंद करते हैं। लाइक करते हैं। कमेंट करते हैं। और आगे शेयर भी करते हैं।


फेमस होने के लिए इस हद तक गिर जाना क्या सही बात है? 


बाहर की कंट्री में ऐसी बेहूदा चीजें एक आम बात हो सकती है। लेकिन वह दिन भी दूर नहीं जब देखा देखी इंडिया में भी इस तरह की चीजें फेमस होने के लिए की जाने लगेगी। क्योंकि फेमस होने के लिए जब online साड़ी का पल्ला नीचे गिरने लग गया है। ब्लाउज के कुछ बटन खुलने लग गए हैं। तो आगे चलकर यदि यह भी होने लग जाए तो इसमें अच्मभे वाली कोई बात नहीं है। क्योंकि लोग ऐसी चीजों को समर्थन दे रहे हैं। कोई इसका विरोध नहीं कर रहा है।


जो इस तरह की गंदगी समाज में फैला रही हैं। ऐसी फोटो और वीडियोस को रोक लगा देना चाहिए। क्योंकि जो लोग ऐसी व्यर्थ की चीजों को देखना नहीं चाहते। ना चाहते हुए भी इसी चीजें उन लोगों के सामने आ जाती है। Government द्वारा ऐसा नियम जरूर बनना चाहिए। जो इन social apps पर एक लगाम लगा सके। ताकि वह सही दिशा में ही आगे बढ़े।



फेमस होने के लिए एक खतरनाक trained और चला है। "Prank videos", prank के नाम पर कुछ भी किया जा रहा है। बेचारा एक भिखारी ठंड में बिना कपड़ों के फुटपाथ पर सो रहा है। और prank videos बनाने के लिए दो बाइक सवार आते हैं। और उसके ऊपर पानी से भरा गुब्बारा फेंककर भाग जाते हैं। इंसानियत नाम की चीज ही नहीं है लोगों में।


Prank के नाम पर लोगों के emotions के साथ खेला जा रहा है। एक video में एक बेटा prank कर रहा है। कि रात के 12:00 बजे उसे भूतनी लग गई। वह बहुत देर तक यह drama करता रहता है। और बेचारे माता-पिता उस drama को सच समझ बैठते हैं। और बुरी तरह घबरा जाते हैं। समझ सकते हो। उस मां का क्या हाल हो रहा होगा। उस मां के तो प्राण हलक में आ गए होंगे। अपने बेटे को इस हाल में देखकर। सोचो यदि उसे heart attack आ जाता तो ? तो वह बेटा खुद को ही जिंदगी भर माफ नहीं कर पाता। कि एक prank के चक्कर में इस झूठे name fame के चक्कर में उसने अपनी ही मां की जान ले ली। 


एक prank वीडियो में seen चल रहा है। कि एक आदमी कुल्हाड़ी से एक दूसरे आदमी पर 10-12 बार अटैक करता है। और वह आदमी लहूलुहान हो जाता है। और वह मर जाता है। फिर वह आदमी एक हाथ से कुल्हाड़ी और एक हाथ से उस लहूलुहान लाश को खींच रहा है। और जो भी उस रास्ते से गुजर रहा है। उसे कह रहा है। लाश को ठिकाने लगाने में मेरी मदद करो नहीं तो मैं तुम्हें भी इसी तरह मार दूंगा। और लोग इस सीन को देखकर घबरा जाते हैं। और अपनी जान छुड़ाकर भागते नजर आते हैं। एक तो भाग भी नहीं पाता यह दृश्य देखकर चक्कर खाकर गिर जाता है। जाहिर सी बात है ऐसा सीन देखकर किसी भी कमजोर दिल वाले को चक्कर ही आएंगे बल्कि heart attack भी आ सकता है। कभी सोचा है। कि यह मौत का prank सच में किसी की मौत का कारण बन गया तो क्या होगा? अभी भी समय है। संभल जाओ। वरना किसी दिन इस prank मैं यदि किस्मत ने तुम्हारा साथ ना दिया। तो तुम्हारे साथ ही बहुत बड़ा prank हो जाएगा। फिर सड़ोंगे जेल की सलाखों के पीछे फिर समझ आएगा। कि यह prank prank का खेल तुम लोगों के साथ नहीं बल्कि अपनी ही जिंदगी के साथ ही खेल रहे थे। यह जिन्दगी prank prank खेलने के लिए नहीं मिली है भाई। कुछ अच्छा करो जिंदगी में कुछ ऐसा करो कि मां-बाप का नाम रोशन कर सको।

यह तो कुछ उदाहरण है। पर सोशल मीडिया एप्स पर ऐसी videos की भरमार है।

आज यह लेख लिखकर मैं इन चीजों के प्रति लोगों को जागरुक (aware) करना चाहती हूं। और चाहती हूं। कि वह भी मेरे साथ इस विरोध में शामिल होकर मेरा साथ दे।


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YouTube video - फेमस होने के लिए ऐसी हरकत कर अपना जीवन बर्बाद ना करें। कहीं आप भी ऐसी वीडियो को समर्थन नहीं दे रहे। Click here



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राधे राधे।

गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

दिसंबर 23, 2021

आसान नहीं ये सफर स्त्री का

प्रस्तावना - दोस्तों "आसान नहीं ये सफर स्त्री का" यह लेख मैं स्त्रियों को समर्पित करती हूं। इस लेख के माध्यम से मेरी यह कोशिश है। कि स्त्री खुद को कमजोर ना समझे और अपनी ताकत को पहचानें। और अपने प्रति हो रहे किसी भी अन्याय को चुपचाप ना सहे।



"आसान नहीं ये सफर स्त्री का"






हरे कृष्णा दोस्तों,



स्त्री हूं मैं, इसलिए मेरा ये सफ़र आसान नहीं है। क्योंकि यहां मेरे ही अपने मुझे आगे बढ़ने से रोकते है। क्योंकि वो समाज की उस घटिया मानसिकता के शिकार हैं। जो सदियों से स्त्रियों के लिए बनी हुई हैं। और इस घटिया मानसिकता के चलते हम स्त्रियों को बचपन से ही कितना कुछ सहना पड़ता है। जहां आज भी स्त्रियों के लिखने पढ़ने पर रोक लगा दी जाती है। यदि इजाजत दी भी जाती हैं। तो सिर्फ माध्यमिक शिक्षा के लिए इजाजत दी जाती है। उच्च स्तरीय शिक्षा के लिए रोक लगा दी जाती है। यह कहकर कि ज्यादा पढ़ लिख कर क्या करोगी ? ससुराल में तो रोटी ही बनानी है। क्यों आज भी हमारे समाज में यह सोच है। कि हमें रोटी ही बनानी है। अपना करियर नहीं बनाना। आखिर क्यों इस 22 वीं सदी में भी हमने अपनी सोच को नहीं बदला ? आज भी हम स्त्री से बस यही अपेक्षा रखते हैं। कि वह अपनी दादी नानी और मां जैसी सारी जिंदगी रोटी बनाती और बर्तन घिसती रह जाए। 


आखिर यह दोहरी मानसिकता क्यों ? जहां एक पुरुष को यह कहा जाता है। कि पढ़ लिखकर कुछ बनो। अपना और मां बाप का नाम रोशन करो। लेकिन एक स्त्री को अपने ही माता पिता ये क्यों नहीं कहते कि पढ़ लिखकर कुछ बनो और अपना नाम रोशन करो। क्यों उसके माता-पिता ही उसके कुछ बनने के सपने नहीं देखते ? बल्कि 18 की होते ही उसकी शादी के सपने देखने लग जाते हैं। और एक स्त्री की जिंदगी तो शादी के बाद और उलझ जाती है। क्योंकि उसके ऊपर कई सारी जिम्मेदारियां थोप दी जाती है। एक अच्छी बहू होने की जिम्मेदारी, एक अच्छी पत्नी होने की जिम्मेदारी, और कुछ सालों बाद एक अच्छी मां होने की जिम्मेदारी इन जिम्मेदारियों के चलते वो खुद को ही भूल जाती है। केवल झाड़ू पोछा बर्तन कपड़े और खाना बनाना ही नहीं बल्कि ऐसे कितने अनगिनत काम है जिन्हें उंगलियों पर नहीं गिना जा सकता। किचन में रोटी बनाते बनाते उसे एक आवाज आती है। सुनो शैंपू खत्म हो गया है। जरा ला देना। Towel तो देना। अरे मेरे socks कहां है। सुनो रोटी बना कर जल्दी से मेरे कपड़े प्रेस कर देना मुझे लेट हो रहा है। हां बस आपका टिफिन लगाकर करती हूं। और पति के घर से निकलते समय रूमाल गाड़ी की चाबी मोबाइल और टिफिन हाथों में पकड़ाना। अब लग जाओ बिखरे हुए कमरे को सही करने में पतिदेव towel पलंग पर छोड़ कर गए हैं धूप में सुखाना है। उनकी झूठी खाने की प्लेट भी तो उठानी है। और सिर्फ पतिदेव ही नहीं घर के अन्य सदस्यों की भी तो जिम्मेदारी हम पर ही हैं। आखिर हम घर की बहू जो है। सिर्फ़ खाना बनाने मात्र से आपकी ड्यूटी खत्म नहीं हुई। घर के बड़ों को आपको खाना परोस के भी तो देना है। उनकी थाली में रोटी खत्म ना हो जाए। इस बात का भी तो ध्यान रखना है। और फिर यदि हमारे होते हुए। उन्हें अपनी झुठी थाली खुद उठाकर रखना पड़े। तो यहां तो हमारे लिए शर्म से डूब के मर जाने वाली बात है। बेचारी हम स्त्रियां सुबह से रात तक इन जिम्मेदारियों के तले दब जाती हैं। और ससुराल वालों की अनगिनत अपेक्षाओं को पूरा करने की जद्दोजहद में लगी होती है। उस पर भी यदि हमसे कोई चूक हो जाए तो ताना मार दिया जाता है। कि माता-पिता ने इतने भी संस्कार नहीं सिखाएं तुम्हें। और यह जिम्मेदारियां बढ़ती चली जाती है। शादी के कुछ समय बाद ही आपके ऊपर एक जिम्मेदारी और आ जाती है। वह है मातृत्व की जिम्मेदारी। और हम स्त्रियां खुशी-खुशी इस जिम्मेदारी को भी निभाने में लग जाती हैं। जिम्मेदारी बढ़ गई। अर्थात सीधा सीधा हमारा काम बढ़ गया। जिसके चलते कई बार ऐसा भी हुआ। कि हमें खुद के ही बालों में कंघी डालने का समय नहीं मिला। रात में यदि बच्चा परेशान करता है। तो रात को जागना भी तो हमें ही है। पतिदेव क्यों जागेंगे भला? उन्हें तो सुबह ड्यूटी पर जाना है। और हमें ऐसा कौन सा काम है? घर का ही तो काम है। वो काम जिसे करते-करते सुबह से रात कब हो गई पता ही नहीं चला? वो काम जिसे करने पर कोई वाहवाही नहीं मिलती। बल्कि ताने पड़ते हैं। वो काम जिसे हम कितने भी अच्छे तरीके से कर ले पर हमारी पदोन्नति नहीं होती। ना ही कोई salary मिलती हैं। और ना ही कोई holiday।और यदि आप बीमार पड़ गए जिसके चलते आपने holiday बना लिया। तो ससुराल वाले खुद के ही घर का काम करने पर आपको इतना सुनाते हैं। जैसे कि आप पर अहसान कर रहे हो। जो आप उनके लिए कर रहे हो उसकी बढ़ाई कभी भी ससुराल वाले पड़ोसियों रिश्तेदारों से नहीं करते बल्कि आपने जो नहीं किया। उसकी चुगली दूरदराज के रिश्तेदारों तक फैल जाती है। की बहू आने का भी क्या फायदा इस बुढ़ापे में भी मुझे रोटी डालना पड़ रही है। वह तो कमर दर्द का बहाना करके पड़ी रहती है। आखिर कैसे उसकी पीड़ा को अनदेखा कर उसे ताने दिए जाते हैं। और इतने ताने दिए जाते हैं कि वह बहू स्लिप डिस्क की असहनीय पीड़ा को सहते हुए भी काम करने की ताकत जुटा लेती है। आखिर कैसे एक औरत जब सास बनती है। तो वहां यह सब भूल जाती है। कि वह भी इसी सफर से गुजरी है।



यह सब सहते सहते एक समय ऐसा आता है। कि उसे अहसास होता है। कि दूसरों को खुश करते करते वह अपनी ही खुशी को अहमियत (importance) देना भूल गई। बल्कि खुद को ही भूल गई। वह तो खाना भी दूसरों की पसंद का खा रही है। उसे याद नहीं उसने कब last time अपने चेहरे पर फेस पैक लगाया था। कब अपने हाथों पर नेल पेंट लगाया था। कब खुद को आईने में फुर्सत से निहारा था। और जिन लोगों के लिए उसने अपनी खुशी को दांव पर लगा दिया। वह तो कभी खुश हुए ही नहीं। और ना कभी हो सकते हैं। क्योंकि वो लोग तो आपसे ना जाने कितनी सारी अनगिनत उम्मीदें लगाए बैठे हैं। और उन उम्मीदों पर आप चाहकर भी खरे नहीं उतर सकते। 



जिस समय पर आप का अधिकार था। वह दिन रात एक कर दूसरों की सेवा में समर्पित कर दिया। और जब उसके प्यार और समर्पण का कोई मोल नहीं समझा जाता। तब उसे यह एहसास होता है। कि उसने क्या गलती की है। और सब कुछ चुपचाप सहती हुई। उस पुरानी स्त्री में से एक नई स्त्री का जन्म होता है। जो हर बात का जवाब देना जानती है। जो अपने प्रति कुछ भी गलत नहीं सहती। जो जिम्मेदारियों के बोझ तले नहीं दबती। उतनी ही जिम्मेदारी निभाती है। जितनी सहजता से निभाई जा सके। क्योंकि अब उसे अपने लिए भी समय निकालना है। कुछ मुकाम हासिल करना है। क्योंकि अब उसके जीवन का उद्देश्य सिर्फ रोटी बनाना नहीं अपना नाम बनाना है। अब उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कौन उसके बारे में क्या कहता है? अब वह अपनी जिंदगी दूसरों की मर्जी से नहीं अपनी मर्जी से जीती है। अपनी पसंद का खाना खाती है। अपनी पसंद के कपड़े पहनती है। अपने जीवन के फैसले खुद लेती है। और किसी को भी यह इजाजत नहीं देती। कि वह उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाए।















यह कहानी मेरी या सिर्फ एक स्त्री कि नहीं बल्कि भारत की हर दूसरी स्त्री की है। क्योंकि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों में यह घटिया मानसिकता आज भी है। पर यह हमें तय करना है। कि हमें वही पुरानी वाली स्त्री बने रहना है। जो सब कुछ चुपचाप सहती रहे और जिम्मेदारियों के बोझ तले खुद को ही भूल जाए। जो आप की कदर नहीं करते उन अपनों के लिए अपने सपनों को भी भूल जाए। या खुद के अंदर उस नई स्त्री को जन्म देना है। जो अपने सपनों को साकार करना जानती है। जो खुद को और अपने सपनों को priority देना जानती है। जो गलत के खिलाफ आवाज उठाना जानती है। जो परवाह नहीं करती लोग उसके बारे में क्या कहते हैं? क्योंकि वह इस सच को अच्छे से जानती है। कि लोगों का उसके प्रति गलत नजरिया उसका व्यक्तित्व नहीं बदल सकता।



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