( हां स्त्री हूं मैं )
प्रस्तावना- "हां स्त्री हूं मैं।" यह कविता आज की सशक्त स्त्रियों के बारे में लिखी गई है। यह कविता यहां दर्शाती है कि परिवार या समाज स्त्री को अबला समझ कर उसके साथ अनुचित व्यवहार करता हैं। और स्त्री सब चुपचाप सहती है। पर उसे अपने ऊपर हो रहे अन्याय को नहीं सहना चाहिए। क्योंकि हर स्त्री सबला है। और हर स्त्री को अपने अंदर छुपी ताकत को पहचानने की आवश्यकता है। जिस दिन स्त्री अपने अंदर की ताकत को पहचान लेती है। वह अपने आप में परिपूर्ण बन जाती है।
कविता ( poetry ) का शीर्षक=
( हां स्त्री हूं मैं )
हां स्त्री हूं मैं,
सदा झुकती आयी हूं।
समाज की ढकोसलेवादी सोच के आगे।
झुकना मेरे संस्कारों में था।
पर लोगों ने उसे मेरी कमज़ोरी समझ लिया।
हां स्त्री हूं मैं,
अब मैं बताना चाहतीं हूं। कि
अबला नहीं, सबला हूं मैं।
कोई परिस्थिति मुझे तोड़ नहीं सकती।
कोई क्या दर्द देगा। एक स्त्री को तो
कुदरत भी दर्द में पालकर बड़ा करती हैं।
हां स्त्री हूं मैं,
अब मैं बताना चाहती हूं कि
सिर्फ सहना ही नहीं आता, कहना भी आता है।
हर बार अग्नि-परीक्षा नहीं दूंगी।
हर बार त्याग नहीं करूगी।
अब नहीं दूंगी कोई प्रमाण अपने
प्रेम और समर्पण का,तुम्हें मानना हों तो मानों
नहीं मानना हों तो नहीं मानो। अब मुझे फर्क नहीं पड़ता।
कोई क्या सोचता है, मेरे बारे में ?
हां स्त्री हूं मैं,
जहां मेरी कदर नहीं अब नहीं रहूंगी वहां।
अब मैं अपने आत्मसम्मान के लिए लडूंगी।
अब मैं सिर्फ़ प्रेम और समर्पण की मूरत बनकर नहीं रह
सकती। बहुत जी लिया दूसरों के लिए
अब मैं अपने लिए जीऊंगी।
हां स्त्री हूं मैं,
और आज की स्त्री हूं। जो ढल नहीं सकती तुम्हारी इस
परम्परावादी सोच के साथ की मुझे जरूरत हैं।
हमेशा एक मर्द की। सच्चाई तो ये हैं कि हमेशा पुरुष को
जरूरत है। एक स्त्री की।
हां स्त्री हूं मैं,
और अब मैं बताऊंगी। कि स्त्री क्या है? अब मैं गढूंगी
खुद को अपनी स्वतंत्रतावादी सोच के साथ। और
बनाऊंगी खुद की पहचान।
हां स्त्री हूं मैं,
और सिर्फ स्त्री ही नहीं आज कि सशक्त स्त्री हूं।
मुझे किसी के सहारे की जरूरत नहीं। बल्कि
मैं सामर्थ रखतीं हूं। दूसरों का सहारा बनने का।
हां स्त्री हूं मैं,
मैं शक्ति स्वरूपा हूं। मैं पहचानती हूं अपने अंदर छुपे नौ
रूपों को। मैं लक्ष्मी भी हूं। सरस्वती भी हूं। मैं अन्नपूर्णा
भी हूं। मैंने हमेशा अपने सौम्य स्वरूप को ही उजागर
किया है।
हां स्त्री हूं मैं,
तुम अनभिग्र हो मेरी असीम शक्तियों से। कही भूल से
भी जाग्रत ना कर देना मेरे अंदर छुपी दुर्गा, काली, चंडी
को। क्योंकि तुम संभाल नहीं पाओगे बुराई का संहार
करने वाले मेरे इस स्वरूप को।
दोस्तों मेरी यह कविता समाज की हर उस स्त्री को समर्पित है। जो अपने आत्मसम्मान के लिए अपने प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ी है। और समाज के कुछ लोग जो ऐसी मानसिकता रखते हैं। कि " स्त्री है! क्या कर लेगी ? कहां जाएगी ?" ऐसा सोच कर उसको शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं। उन लोगों को संदेश हैं। कि स्त्री सिर्फ तब तक कमजोर है। जब तक वह अपने अंदर छुपी हुई अपनी शक्तियों को भूली हुई है। और जिस दिन उसे अपनी इन शक्तियों का ज्ञान हुआ। वह तुम्हारे हर अन्याय के खिलाफ खड़ी हो जाएगी।
राधे राधे।
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