हरे कृष्णा दोस्तों,
दोस्तों, "Law of attraction" अर्थात इस universe के आगे, ईश्वर के आगे हम अपनी demand रखते हैं। कि हमें फलाना फलाना चीज चाहिए। हम उसे बार बार दोहराते हैं। visualise करते हैं। manifest करते हैं।
जब हम उस चीज के प्रति प्रयासरत होते हैं। उसके काबिल होते हैं। तो वह चीज हमें मिल भी जाती है।
Surrender - ( समर्पण )
"समर्पण" जहां ईश्वर से कुछ मांगा नहीं जाता। सब कुछ ईश्वर पर ही छोड़ दिया जाता है। वो जो भी दे दे। उसे खुशी-खुशी स्वीकार किया जाता है। जहां लोभ, लालच,अहंकार सब को त्याग कर खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देना होता है।
जहां मन में यह समर्पण भाव उठे
"हे ईश्वर मैं भी तेरी।
मेरी यह जिंदगी भी तेरी।
मेरी हस्ती को मिटा दे। या बना दें।
जैसी भी हो रज़ा तेरी।
तेरी दी हर चीज मंजूर है मुझे।
तू सुख दे या दुख दे, यह मर्जी तेरी।"
जब हम उसके हो जाते हैं। खुद को उसके प्रति समर्पित कर देते हैं। तो उसकी रजा में ही हमें मजा आने लगता है। जीवन में बड़े से बड़ा दुख आने पर भी हम उस पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते? कि मेरे ही साथ ऐसा क्यों?
इस भाव के साथ उस पर पूर्ण विश्वास रखते हैं। कि वह जो करता है। हमारे लिए अच्छा ही करता है। इसमें हमारा ही भला छुपा होता है। यदि उसने हमें कड़वी दवा पिलाई है। तो कहीं ना कहीं हमारी किसी बीमारी को ही वहां ठीक कर रहा है।
समर्पण अर्थात ईश्वर से कुछ मांगा नहीं जाता। ईश्वर या इस यूनिवर्स के आगे अपनी कोई मांग नहीं रखना है।
दोस्तों महाभारत का एक वाक्या है। जो आप सभी ने सुना ही होगा। जिसमें अर्जुन और दुर्योधन श्री कृष्ण के आगे अपनी मांग रखते हैं। तब दुर्योधन श्री कृष्ण से पूरी नारायणी सेना मांग लेता है। और जब अर्जुन की बारी आती है। तब अर्जुन श्री कृष्ण से कहता है। की हे कृष्ण मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस आप मेरे साथ रहे। आप मेरी तरफ रहे। मुझे सिर्फ आप ही चाहिए। और आपका मार्गदर्शन चाहिए।
उस समय भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन की चुटकी (मजाक) लेते हुए कहा।
"हार निश्चित है। तेरी,
हरदम रहेगा उदास।
माखन दुर्योधन ले गया।
केवल छाछ बची तेरे पास।"
अर्जुन ने इसके जवाब में कहा-
"हे प्रभु जीत निश्चित है। मेरी,
दास हो नहीं सकता उदास।
माखन लेकर क्या करूं?
जब माखन चोर है मेरे पास।"
उनसे कुछ मांगना ही है। तो बस उनसे उन्हें ही मांगना, उनका प्रेम मांगना, उनका मार्गदर्शन मांगना। उनका साथ मांगना। कि हे ईश्वर जीवन की इस मुश्किल डगर में आप मेरा हाथ थामे रखना।
यह बात तो सभी जानते हैं। कि जिसके साथ ईश्वर है। उसकी अंत में जीत निश्चित है।
समर्पण वही कर पाता है। जो ईश्वर से निस्वार्थ प्रेम करता है।
जहां ईश्वर से कोई business deal नहीं होती। कि मेरा फलाना काम हो जाए। मैं इतने व्रत रखूंगी। मेरा यह काम हो जाए। मैं गोवर्धन की परिक्रमा लगाऊंगा। यहां में कुछ कड़वे शब्दों का प्रयोग कर रही हूं। शायद कुछ भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुंचे। पर इसे business deal नहीं तो और क्या कहेंगे? जहां एक लोटा जल या दूध के बदले ईश्वर से ना जाने क्या-क्या मांगा जाता है। गर हमारा स्वार्थ ना हो तो हम उसे दो अगरबत्ती भी ना लगाएं। हम उसके दर पर हमेशा कुछ ना कुछ मांगने ही तो जाते हैं।
बिजनेस और निस्वार्थ प्रेम दोनों एक दूसरे के विरुद्ध है। जहां बिजनेस होता है। वहां प्रेम नहीं हो सकता और जहां प्रेम होता है। वह बिजनेस नहीं हो सकता।
ईश्वर से निस्वार्थ प्रेम कीजिए। उसकी निस्वार्थ सेवा कीजिए। उसे जो भी देना है। निस्वार्थ भाव से दीजिए। फिर देखना वहां खुश होकर हमें क्या-क्या नहीं दे देगा।
इस बात पर एक वाक्या मैं आपको सुनाती हूं।
सुदामा के जीवन का बहुत कष्ट दाई समय चल रहा था। तन पर पर्याप्त कपड़े नहीं थे। और दो वक्त का भोजन भी नसीब नहीं हो रहा था। तब सुदामा की पत्नी सुदामा से कहती है। कि तुम्हारे मित्र तो इतने धनवान है। उनके पास जाओ। अपने मित्र से मदद मांगना। वे अवश्य तुम्हारी मदद करेंगे।
और पत्नी के कहने पर सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण से मिलने द्वारका के लिए निकल पड़ते हैं। और अपने सामर्थ्य अनुसार एक मुट्ठी चावल भेंट स्वरूप मित्र को देने के लिए अपने पास रख लेते हैं। और जब वे द्वारिका पहुंचते हैं। तब श्री कृष्ण को संदेश मिलता है। कि उनके मित्र सुदामा उन्हें मिलने आए हैं। तब श्री कृष्ण दौड़ते हुए अपने मित्र से मिलने आते हैं। और उन्हें गले लगा लेते हैं। और बड़ी ही दरियादिली से अपने मित्र की आवभगत करते हैं। उनके चरणों को धोते हैं। और इस अपार प्रेम, सम्मान और सेवा के आगे सुदामा अपनी छोटी सी मांग को रखना अनुचित समझते हैं। बिना मांगे ही रह जाते हैं। और जिस भेंट के बदले में वे कृष्ण से कुछ स्वर्ण मुद्राएं मदद स्वरूप मांगने वाले थे। वे नहीं मांगते। और अपने मित्र से कहते हैं। कि तुमने मुझे इतना प्रेम और सम्मान दिया। उसके बदले में मैं बहुत ही तुच्छ सी भेंट तुम्हारे लिए लाया हूं। अपनी पोटली के एक मुट्ठी चावल निस्वार्थ भाव से उन्हें दे देते हैं। और बिना कुछ मांगे ही द्वारिका से चले जाते हैं।
जब सुदामा अपने गांव पहुंचते हैं। तो देख कर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। उसकी टूटी फूटी झोपड़ी की जगह बहुत ही सुंदर सा महल खड़ा होता है। उसके बच्चे सुंदर सुंदर वस्त्र पहने होते हैं। उसकी पत्नी सुंदर वस्त्र और महंगे महंगे रत्न जड़ित स्वर्ण आभूषण पहनी होती है।
सुदामा अपनी पत्नी से पूछते हैं। तो उनकी पत्नी कहती है। कि तुम्हारे मित्र श्री कृष्ण की कृपा से ही यह सब हमें मिला है।
दोस्तों सोचिए अगर सुदामा ने अपने मित्र श्री कृष्ण से कुछ मांगा होता। उनके आगे अपनी कुछ मांग रखी होती। तो वह कुछ स्वर्ण मुद्रा ही पाते।
क्योंकि जब हम कुछ मांगते हैं। तो अपनी औकात के अनुसार ही मांग पाते हैं। और जब वह हमें बिना मांगे ही कुछ देता है। तो अपनी औकात के अनुसार देता है।
और ईश्वर की औकात क्या है? इसका आंकलन करना हमारी औकात के बाहर है।
ईश्वर से भला क्या मांगना? वह तो सब जानता है। कि तुम्हारे जीवन में किस चीज की कमी है।
कुछ पाने के लिए नहीं। निस्वार्थ भाव से उसकी सेवा करो, सत्कर्म करो। उसके प्रेम के, उसकी दया के, उसकी कृपा के काबिल बनो।
यदि निस्वार्थ भाव से हमने मुट्ठी भर भी उसे कुछ समर्पित किया। तो वहां खुश होकर हमें मुट्ठी भर भी दे दे। तो हमारे पास इतना होगा। जो हमसे संभाले भी नहीं संभलेगा। उसकी मुट्ठी तो आप समझ ही सकते हो कितनी बड़ी है। उसमें कितना कुछ समा सकता है। जब उसकी कृपा होती है। तो बिना मांगे भी इतना मिल जाता है। जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
दोस्तों समर्पण भाव को दर्शाती एक भजन की कुछ लाइनें मैं यह पर लिख रही हूं। अगर यह आपके हृदय को छूती हैं तो आप समर्पण भाव को समझ सकते हैं।
तुम्हारे सिवा ना कोई चाहत करेंगे।
जब तक जीयेंगे, इबादत करेंगे।-2
नजर चाहती है। दीदार करना।
ये दिल चाहता है। तुम्हें प्यार करना।-2
तेरे श्री चरणों के पास जब जाए।
मस्ती इलाही में दिल झूम जाए।-2
सदा ही मिले बस प्यार तुम्हारा।
इसे हम अपनी खुशकिस्मत कहेंगे।-2
तुम्हारे सिवा ना कोई चाहत करेंगे।
कि जब तक जिएंगे इबादत करेंगे।-2
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Law of attraction v/s surrender
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राधे राधे



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