हरे कृष्णा दोस्तों,
दोस्तों, आज मातृ दिवस के अवसर पर मैं आपको बहुत प्यारी सी कहानी सुना रही हूं।
एक बार की बात है। ईश्वर कुछ गढ़ रहे थे। एक अप्सरा वहां से गुजरी और उसने ईश्वर से पूछा यह आप क्या बना रहे हैं? मैं आपको लगातार 6 दिन से काम करते देख रही हूं। ईश्वर ने जवाब दिया। मैं "मां" को गढ़ रहा हूं। अप्सरा की जिज्ञासा थी। कैसी बनानी है "मां" ?
ईश्वर ने उत्तर दिया।
जिसकी कोख से मानवता जन्मे....
जिसकी गोद में सृष्टि समा जाए....
जिसका स्पर्श बड़ी से बड़ी चोट को सहला कर ठीक कर दे....
जिसका दुलार बड़े से बड़े सदमे से उबार दें....
जिसके दो हाथ सबको दिखे, पर हो कई....
ताकि जीवन संवारने का उसका कर्तव्य,
बिना बाधा पूरा हो सके......
जिसके मन में भी आंखें हो। जिससे वह,
दूर बैठी अपनी संतान को देख सके.....
जो बीमार होने पर भी 10 लोगों वाले
परिवार के लिए हंसकर भोजन बना दे.....
नाजुक हो पर हर मुश्किल को,
हरा सकने का दम रखें.....
जिसके आंचल तले सृष्टि को सुरक्षा मिले....
जिस के नेत्रों में अपने बच्चों के लिए,
भाव भरा जल हो, और उनके शत्रुओं के लिए ज्वाला.....
जिसके दर्शन मात्र से मानवता कृत कृत हो जाए...
मैं उसे गढ़ रहा हूं। जिसे मानव ठेस तो बहुत पहुंचाएगा.....
पर उसका हाथ ना आशीर्वाद देने से रुकेगा और ना दिल दुआ मांगने से....
बहुत पहले यह लेख किसी news paper में पढ़ा बहुत अच्छा लगा। जिसे मैंने अपनी डायरी में सहेज कर रख लिया। और आज आप लोगों के साथ शेयर किया।
कुछ जज़्बात दूसरों के और कुछ अपने मिलाकर एक नया flavour आप लोगों को परोस रही हूं। आशा है। आप लोगों को पसंद आएगा।
किसी ने बिल्कुल सही कहा है। कि दुनिया के हर रिश्ते के प्यार को यदि कंपेयर किया जाए। तो "मां" का प्यार हर रिश्ते से 9 महीने ज्यादा ही निकलेगा।
एक "मां" ही है। जो अपनी संतान के दुनिया में आने से पहले ही और उसे बिना देखे ही उस से प्रेम करने लग जाती है।
जब अपने बच्चे को जन्म लेने के बाद मैंने पहली बार उसे गोद में लिया। तब समझ में आया। कि मां बनने का क्या एहसास होता है? कि कैसे एक मां अपने बच्चे के मासूम से चेहरे को देखकर उस असहनीय पीड़ा को भूल जाती है। जिससे वह कुछ पल पहले ही गुजरी।
यह समझ आया। कि क्यों "मां" को ईश्वर का दर्जा दिया जाता है। क्योंकि जीवन देने वाला ईश्वर है। तो उस जीवन को जन्म देने वाली मां ही होती है।
यह समझ आया। कि क्यों "मां" ईश्वर के समान सम्माननीय है। क्योंकि अपनी संतान को जन्म देने के लिए वह कैसे अपनी जान को दांव पर लगा देती है। क्योंकि जब वो प्रसव पीड़ा में होती है। तब उसका एक पैर जिंदगी की दहलीज पर तो दूसरा पैर मौत की दहलीज पर रखा होता है। इसका कोई भरोसा नहीं होता। कि उसका नसीब किस ओर उसे ले जाएं।
यह सत्य घटना है। जहां मैं अपने बच्चे के आने की खुशी मना रही थी। वही पास वाले वार्ड में रोने धोने की आवाज आ रही थी। और मुझे पता चला। की शादी के 2 साल ही हुए थे। पहला बच्चा था। वे लोग एक दूसरे हॉस्पिटल से रेफर किए हुए थे। उस हॉस्पिटल से इस हॉस्पिटल तक लाने के रास्ते में ही बच्चेदानी फट गई। और बच्चें को जन्म देने से पहले ही वह मर गई। और ऑपरेशन कर बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
हमारा यह जीवन पहला उस ईश्वर तो दूसरा उस "मां" की देन है। जिसने हमें जन्म दिया। इसलिए हमें सदा उनका शुक्रिया मानना चाहिए।
एक "मां" अपने बच्चें के लिए सिर्फ प्रसव पीड़ा ही नहीं सहती अपितु अपने बच्चें के जन्म लेने से पहले और उसके जन्म लेने के बाद भी ना जाने कितनी तकलीफों से गुजरती है। कितने ही शारीरिक और मानसिक बदलावों से गुजरती है। बच्चें को सुलाने की खातिर वह खुद रातों को जागती है।
सिर्फ नींद ही नहीं ना जाने कितने ख्वाब उसके अधूरे रह जाते हैं। दिन रात वो अपने बच्चें की सेवा में लग जाती है। वो खुद की पहचान बनाना भूल जाती है। जब एक स्त्री "मां" बन जाती है। अपने बच्चें की खातिर ना जाने क्या-क्या कुर्बान कर जाती है। जब एक स्त्री "मां" बन जाती है। उसके समर्पण का कर्ज़ जिंदगी भर नहीं चुकाया जा सकता।
"मां" तुम्हारी दुख तकलीफों को, तुम्हारी पीड़ा को तुम्हारे संघर्ष को, तुम्हारे समर्पण को और तुम्हारे एहसासों को मैं तब समझी जब मैं खुद ना बनी।
और इन सबके बदले मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकती सिवाय प्रेम और सम्मान के। और इन सब के लिए तुम्हारा तहे दिल से शुक्रिया करती हूं। और यह लेख व अपने हृदय की यह भावनाएं तुम्हें समर्पित करती हूं।
दोस्तों यदि आपको मेरी यह post अच्छी लगी तो आप इसे आगे भी शेयर करें। दोस्तों मेरे काम को सरहाने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया। आशा करती हूं। आपका और हमारा यह स्नेह पूर्ण संबन्ध सदा बना रहेगा। आप मुझे youtube और Instagram page पर भी follow कर सकते हैं।
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धन्यवाद्।
राधे राधे

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