प्रस्तावना- "सुन ले अपनी अंतरात्मा की आवाज" यह कविता इस और संकेत करती है। कि हम इस दुनिया में इंसान के रूप में जन्म लेते हैं। परंतु बड़े होने पर अहंकार, लालच, इर्ष्या, द्वेष, आदि विकारों में पड़कर अपनी इंसानियत को खो बैठते हैं। और इन विकारों के वशीभूत होकर ऐसे कई कार्य करते हैं। जो इंसानियत को शर्मसार कर देते है। इंसान की अंतरात्मा हमेशा ऐसे कार्य करने को अंदर से रोकती है। जो दूसरों को दुख दर्द या तकलीफ पहुंचाते हैं। परंतु इंसान अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना कर जाने अनजाने में ऐसे कई कार्य करता है। जो दूसरों की तकलीफ का कारण बनते है। और जब हम दूसरों की तकलीफ का कारण बनते हैं। तो कहीं ना कहीं हमारी जिंदगी भी तकलीफदेय हो जाती है। क्योंकि यही प्रकृति का नियम है। जो हम देते हैं। वही हमारे पास लौट कर आता हैं। यदि हमने अच्छा दिया है। तो अच्छा ही लौटकर आएगा। भले ही हमने जहां दिया है। वहां से लौटकर ना आए। कहीं ओर से लौटकर आए पर आएगा जरूर।
"सुन ले अपनी अंतरात्मा की आवाज"
तुम्हारे अंदर का इंसान कहीं खो गया है।
भटक गया है। अच्छाइयों के रास्ते से।।
द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार में पड़कर।
ना जाने कितने दिलों को चोट पहुंचाते हो।।
लोभ और लालच में आकर।
अपनों को ही दगा दे जाते हो।।
ऊपर जाकर जब हिसाब होगा कर्मों का,
बुरे कर्मों की भरमार और अच्छे कर्मों का
अकाउंट तो खाली पाते हो।
पैसा, नाम, दौलत, शोहरत जोड़ने में तुम लग जाते हो।
दुनियादारी की इस अंधी दौड़ में तुम दौड़ जाते हो।
दुनिया से ही तो तुम बात करते हो।
दुनिया की ही तो तुम सुनते हो।।
जब खुद का नंबर लगाते हो।
तो हमेशा व्यस्त पाते हो।।
अभी भी कहां देर हुई है।
सुन ले अपनी अंतरात्मा की आवाज।।
हर डाकू के अंदर छिपा है।
आज भी एक कालिदास।।
जब इस छिपे हुए इंसान को तुम,
बाहर निकालते हो।
इतिहास गवाह है पुरुष ही नहीं,
अपितु महापुरुष तुम बन जाते हो।।
जब तुम्हारे अंदर की इंसानियत जागती हैं।
तो धर्म की पराकाष्ठा को तुम पा जाते हो।।
वेद पुराण की आवश्यकता नहीं फिर तुम्हें।
क्योंकि किसी की वेदना को तुम पढ़ जाते हो।।
बुरे कर्म हमेशा पछतावा देते हैं।
अच्छे कर्मों से ही तुम सुकून पाते हो।।
प्रकृति का नियम है यह, ना कुछ लेकर आते हो।
ना कुछ लेकर जाते हो।।
फिर किस लालच में आखिर।
बुराई और पाप के दलदल में तुम फंसते जाते हो।।
दोस्तों इस कविता के जरिए मैंने यहां समझाने की कोशिश की है कि यदि हम अपने मन के भीतर अहंकार, क्रोध, इर्ष्या, लोभ, द्वेष आदि विकारों को पालेंगे तो सबकुछ होने के बाद भी कभी भी जीवन में मन का सुकून नहीं पा सकते।
यदि हम इन विकारों से ऊपर उठकर अपने अंदर छुपे हुए इंसान को बाहर निकालते है। तब हम अपने जीवन के महानतम लक्ष्यों की प्राप्ति करते है। और यदि दया, क्षमा, करुणा, निस्वार्थ प्रेम आदि भावों को अपने मन के भीतर स्थान देते हैं। तो जीवन में हमेशा सुखी और संतुष्ट रहेंगे।
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