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मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

भक्त और भक्ति - क्या सही ? क्या गलत ?

प्रस्तावना -  दोस्तों "भक्त और भक्ति - क्या सही ? क्या गलत ?" इस लेख में मैंने भगवान् के भक्तों और उनकी भक्ति को लेकर लोगों के मन में जो गलत धारणाएं बनी हुई है। उनके ऊपर प्रकाश डाला है। यदि आपके मन में भी भक्ति को लेकर कोई प्रश्न है। तो आप हमसे पूछ सकते हैं। हम कोशिश करेंगे आपके प्रश्नों का उत्तर दे सके। 
















हरे कृष्णा दोस्तों,



दोस्तों अधिकतर लोगों के मन में यह धारणा बनी हुई है। कि जो भगवा वस्त्र धारण किए हुए हैं। जिनके सर पर जटाएं हैं। अनेक प्रकार की माला धारण किए हुए हैं। सिर्फ़ वे ही ईश्वर के अनन्य भक्त है। 



इसी धारणा के चलते कई बुरे लोग साधु संतों पीर फकीर की वेशभूषा में लोगों के साथ भगवान के नाम पर ठगी करते हैं। क्योंकि हम उन्हें ऊपर से उनके कपड़ों के माध्यम से जांचते हैं। उनके अंदर क्या है? वह किस नियत से हमारे पास आए हैं? यह समझने की कोशिश नहीं करते। और ठगी का शिकार हो जाते हैं।



मैं यह नहीं कह रही हूं। कि आप ठगी के डर से हर साधु महात्मा को ही गलत समझे और उन्हें अपने दरवाजे से खाली हाथ भगा दे। अपनी क्षमता अनुसार कुछ ना कुछ अवश्य दें। परंतु सावधानी और सतर्कता के साथ।



सिर्फ बाहरी रूप से आडंबर कर इंसान को तो बेवकूफ बनाया जा सकता है। परंतु ईश्वर को नहीं। क्योंकि ईश्वर तो हमें सिर्फ बाहरी रूप से ही नहीं अंदरुनी रूप से भी जानता है। हमारे अंतर्मन को जानता है। हमारी नीयत को जानता है। हमारे कर्मों को जानता है।

















आख़िर हमने यह गलत धारणा क्यों बना ली? कि सिर्फ साधारण वेशभूषा में ही ईश्वर की भक्ति की जा सकती है। फैशनेबल कपड़ों में नहीं। 



आपके शरीर पर कपड़े हैं। या नहीं है। या किस प्रकार के कपड़े हैं। इन चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि ईश्वर की भक्ति तो शरीर से नहीं मन से होती है और आपके मन में क्या है? इस बात से फर्क पड़ता है।



भक्ति को लेकर ऐसी कितनी ही गलत धारणाएं लोगों ने बना रखी है।



जैसे कि भगवान की मूर्ति के आगे दीया फेर लिया अगरबत्ती फेर ली। माला फेर ली। अपनी जुबान से कुछ मंत्र फेर लिए बस हो गई भक्ति। बाहरी रूप से किए गए यह कार्य आपके शरीर को तो भगवान से जोड़ देते हैं। पर आपकी आत्मा को नहीं जोड़ पाते। यह तो उन लोगों के लिए हैं। जिन्हें कुछ भी नहीं आता जैसे नर्सरी के बच्चों को अभी हाथ पकड़ कर लिखना सिखाया जा रहा है। अगर हम जीवन पर्यंत यही करते रहे। तो भक्ति में भी नर्सरी के लेवल पर ही रहेंगे। असल में भक्ति का अर्थ माला फेरना नहीं। अपितु मन को ईश्वर में फेर लेना है। इसी बात पर कबीर जी का एक प्रसिद्ध दोहा मुझे याद आया है।



माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि।

मनुवां तो चहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नांहि ।।

        


अर्थात माला हाथ में फिर रही है और जीभ मुख में फिर रही हैं। और आपका मन तो चारों दिशाओं में फिर रहा है। यह तो प्रभु का सुमिरन नहीं है।




प्राथना करते समय 

व्यक्ति का मंदिर में होना

आवश्यक नहीं, किन्तु

व्यक्ति के मन में,

ईश्वर का होना

अति आवश्यक है।



ईश्वर को पाने के लिए बाहरी यात्रा तो बहुत कर ली।  अब अंदर की यात्रा करने का समय है। जिसे पाने की खोज में तुम बाहर भटक रहे हो। वह तो तुम्हारे ही भीतर बैठा है। उस तक पहुंचने का रास्ता बाहर कहीं नहीं तुम्हारे ही भीतर से होकर गुजरता है। कुछ पल शांति में ध्यान लगाइए और अपने अंदर झांकिये।



















एक गलत धारणा और प्रचलित है। जैसे कि भक्ति करना अर्थात भगवान से जुड़ना तो वृद्धावस्था का कार्य है। अभी तो हम बच्चे हैं। या जवान हैं। अभी से क्या राम राम जपे। अभी तो सर पर कितनी सारी जिम्मेदारियां हैं। इन जिम्मेदारियों से फ्री होकर अपने बुढ़ापे में आराम से प्रभु की सेवा करेंगे।



तो मैं आपको यह बता दूं। कि भगवान से जुड़ने का सही समय वृद्धावस्था नहीं है। बल्कि हमें जीवन के शुरुआती चरण में ही भगवान से जुड़ जाना चाहिए। ताकि हमें अपने जीवन का उद्देश्य (life purpose) ज्ञात हो सकें। और हम उस दिशा में कार्य कर सकें। जीवन के अंतिम पड़ाव पर आत्मज्ञान होने का कोई फायदा नहीं। क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। हमारा यह मनुष्य जीवन बिना कुछ करे ही व्यर्थ चला जाता है। भक्ति के लिए अर्थात भगवान से जुड़ने के लिए हमें वृद्धावस्था का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं। और ना ही अपनी जिम्मेदारियों को त्याग कर सब कुछ छोड़ छाड़ कर भगवान की शरण में जाना है। बल्कि संसार में रहकर और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए हम भक्ति कर सकते हैं। और भगवान से जुड़ सकते हैं।



लोगों ने यह भी गलत धारणा बना रखी है। कि ईश्वर से जुड़ने का मतलब है। की आपके जीवन में विषम परिस्थितियां नहीं आएंगी। 



विषम परिस्थितियां आती है। परंतु जिनके हृदय में प्रभु बसते हैं। उन्हें हर परिस्थिति में सम रहने की कला आ जाती है। बल्कि प्रभु भक्ति में रमे भक्त तो आपको विषम परिस्थितियों में भी मुस्कुराते मिलेंगे।



भक्त इसलिए प्रसन्नचित्त नहीं रहते। कि उनके जीवन में विषमताएं नहीं रहती हैं। अपितु इसलिए प्रसन्नचित्त रहते हैं। कि उनके जीवन में धैर्य रहता है। किसी भी प्रकार की विषमताओं से निपटने के लिए अपने इष्ट अपने आराध्य का नाम अथवा विश्वास होता है।



ईश्वर के प्रति हमारा विश्वास और यह भक्ति ही जीवन की कठिन परिस्थितियों में साहस, आत्मविश्वास और धैर्य प्रदान करती है। जिस जीवन में प्रभु की भक्ति नहीं होगी, निश्चित समझिए उस जीवन में धैर्य नहीं पनप सकता।


भक्त के जीवन में परिश्रम तो बहुत होता है। मगर परिणाम के प्रति ज्यादा उतावलापन नहीं होता है। वो इतना जरूर जानता है। कि मेरे हाथ में केवल कर्म है। उसका परिणाम नहीं। मैंने कर्म को पूरी निष्ठा से करके अपना कार्य पूरा किया। अब आगे परिणाम जैसे मेरे प्रभु को अच्छा लगेगा। वही आयेगा।


विपरीत से भी विपरीत परिस्थितियों में भी अगर कोई हमें मुस्कुराकर जीना सिखाता है। तो वो केवल और केवल हमारा धैर्य ही है। धैर्य के समान आत्मबल प्रदान करने वाला कोई दूसरा मित्र नहीं।









मेरे कान्हा तेरी संगति का अब ये असर हुआ,

पहले हँसते हुए भी रोया करते थे।

अब भीगी पलकों में भी मुस्कुराते हैं हम।


            🙏🌹जय श्री कृष्णा🌹🙏

            🙏🌹 राधे राधे 🌹🙏




                                           Writer

                    krishna prerna✍️


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