प्रस्तावना - क्या होती हैं भगवन् कृपा? इस लेख में मैने स्पष्ट किया है। कि भगवन् कृपा का सही अर्थ क्या है?
हरे कृष्णा दोस्तों,
दोस्तों अक्सर लोग भौतिक सुख साधनों की प्राप्ति को ही भगवन् कृपा या देवीय कृपा समझते हैं।
अधिकांशत: सुख साधन से संपन्न व्यक्ति के बारे में लोगों का यही नजरिया होता है। कि भगवान् की उस पर बड़ी कृपा है। यह बात सत्य है। इसमें कहीं कोई संशय नहीं है। क्योंकि देने वाला तो वही है। उसी की कृपा से इतना वैभव और सम्पन्नता किसी को प्राप्त हो सकती है।
परंतु जो बाहरी रूप से प्राप्त हुआ। सिर्फ उसे ही भगवन् कृपा से जोड़ा जाना ठीक नहीं है। यह तो आधा सच है। क्योंकि भगवन् कृपा तो तब भी मानी जाती है। जब बाहरी रूप से कुछ भी प्राप्त ना हुआ हो। परंतु भीतर से तृप्ति हो जाए। कृपा का असली मतलब तो बाहर की नहीं अपितु भीतर की ही तृप्ति है। बाहरी रूप से बहुत कुछ होने पर भी जहां मन और अधिक पाने की लालसा में दौड़ रहा है। और बहुत कुछ प्राप्त होने के बाद भी जहां शिकवे शिकायते है। महलों में रहने पर भी जहां आप चिंताग्रस्त है। और अपने जीवन की किसी कमी को लेकर आंसू बहा रहे हैं। और इतना कुछ होने पर भी रिक्तता महसूस कर रहे है। तो वह सिर्फ आपका पुरुषार्थ और आपका प्रारब्ध है। जिसके बल पर आपको यह सब मिला। क्योंकि भगवन् कृपा तो सबसे पहले आपके मन की रिक्तता को भर देती है। मन का भौतिकता के पीछे दौड़ना बंद हो जाता है। मन आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। सब कुछ प्राप्त ना होने पर भी भीतर एक तृप्ति बने रहना, यह अवश्य भगवन् कृपा ही है। और ऐसी भगवन् कृपा तो उन पर ही बरसती हैं। जो मन से निश्चल है। और ऐसे निश्चल मन अर्थात हृदय में ही प्रभु का वास होता है। रिक्तता उसी के अंदर होती है। जिसके मन के अंदर भगवान का वास नहीं होता। क्योंकि जिस हृदय में भगवान बसते हो वहां रिक्तता कैसी? वहां तो आनंद ही आनंद होता है।
जैसे मीराबाई ने महल की भव्यता को त्याग दिया था। उनके पास बाहरी रूप से कुछ नहीं होने पर भी आंतरिक रूप से प्रभु कृपा का वैभव था। वे अपने भजनों में गाती थी।
"पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।"
दोस्तों सांसारिक धन तो बहुत लोग पा लेते हैं। लेकिन वे विरले ही होते हैं। जिनके ऊपर भगवन् कृपा होती है। और "राम रूपी धन" प्राप्त करते हैं। क्योंकि इसको पाने के बाद कुछ और पाने की इच्छा शेष नहीं रहती। जीवन की रिक्तता ही समाप्त हो जाती है। जीवन आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। इस आनंद को पाने के लिए ही गौतम बुद्ध ने अपना राजपाट और इतने बड़े साम्राज्य को त्याग दिया। आपके पुरुषार्थ से और प्रारब्ध से आपको प्राप्ति तो संभव है। मगर तृप्ति नहीं वह तो केवल और केवल प्रभु कृपा से ही संभव है। बाहरी वैभवता आपके जीवन को आरामदायक बना सकती हैं। परन्तु आनंददायक नहीं। आनंददायक जीवन तो प्रभु कृपा से ही संभव है। अत: भीतर की तृप्ति, भीतर की धन्यता, भीतर का अहोभव यही तो सबसे बड़ी भगवन् कृपा है।
YouTube video - क्या होती हैं भगवन् कृपा? Click here
दोस्तों यदि आपको क्या होती हैं भगवन् कृपा? मेरी यह post अच्छी लगी। तो आप इसे आगे भी शेयर करें। दोस्तों मेरे काम को सरहाने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया। आशा करती हूं। आपका और हमारा यह स्नेह पूर्ण संबन्ध सदा बना रहेगा। नीचे दी गई red line पर touch करके आप मुझे youtube और facebook page पर भी follow कर सकते हैं।
Related post - सिर्फ एक प्रण ले मां के हर रूप की कृपा आप पर बरसेगी। Click here
धन्यवाद।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
If you have any problam please let me know.