प्रस्तावना - इस लेख में मैने आपको परमात्मा से जुड़ने का सीधा और सच्चा रास्ता बताया है। इस रास्ते पर चलकर उसकी अपार कृपा और प्रेम आप पर बरसने लगता हैं।
हरे कृष्णा दोस्तों,
दोस्तों कुछ चीजें समीप जाने से बिना मांगे ही मिल जाती है। जैसे अग्नि से गर्माहट, बर्फ से शीतलता, और फूलों से सुगंध। उसी तरह ईश्वर से भी कुछ मांगिए मत। बस निकटता बढ़ाइए। आपको सब कुछ बिना मांगे ही मिलने लगेगा। परंतु शर्त यह है। कि यह निकटता हृदय से होनी चाहिए। अब प्रश्न उठता है। कि ईश्वर के हृदय के समीप कैसे जाएं। तो यहां पर मैं आपको कोई मंत्र, कोई टोना टोटका या कोई उपाय नहीं बता रही हूं। बल्कि ईश्वर के हृदय तक पहुंचने का सबसे सीधा और सच्चा रास्ता बता रही हूं। इस रास्ते पर चलकर आपका ईश्वर के हृदय के समीप पहुंचना 100% तय हैं।
अब आप खुद से प्रश्न कीजिए। कि आपके हृदय के सबसे करीब कौन रहता है? इसका सीधा-सीधा answer है। कि जिससे हम प्रेम करते हैं। या जो हमसे प्रेम करता है। वह हमारे हृदय के सबसे करीब रहता है। तो उस परमपिता परमात्मा के हृदय तक सीधा पहुंचने का एक ही रास्ता है। वह है प्रेम। निस्वार्थ प्रेम। और ईश्वर से किया गया यह निस्वार्थ प्रेम ही उस ईश्वर की अनन्य भक्ति है।
प्रेम ही वह बंधन है। जिसमें सारे जगत को बांधने वाला ईश्वर स्वयं बंध जाता हैं।
अब प्रश्न उठता है? कि उससे प्रेम कैसे करें? तो प्रेम तो उसी से होता है। जिसे हम अपना मानते हैं। जिसके प्रति हमारे मन में अपनापन होता है। तो उसे दिल से अपना बनाईए। उसके साथ कोई रिश्ता बनाइए। उसे अपना पिता मानिए। माता मानिए। भाई मानिए। मित्र मानिए। पुत्र मानिए। गुरु मानिए या भगवान या भक्त का रिश्ता। जो भी रिश्ता चुनिए। दिल से चुनिए। और दिल से निभाइए। जब उस परमपिता परमात्मा से हम प्रेम करते हैं। तो बदले में उसका अथाह प्रेम और कृपा हम पर बरसने लगती है। फिर हमें उससे कुछ मांगने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। बिना मांगे ही सब कुछ प्राप्त होने लगता है। जीवन में सही मार्गदर्शन मिलता है। जिससे आप हर जगह सफलता हासिल करते हैं। उस परमपिता परमात्मा से आप जो रिश्ता बनाते हैं। वह भी उसी शिद्दत से उस रिश्ते की लाज रखता है। जैसे द्रौपदी ने भाई माना तो एक भाई बनकर अपनी बहन की लाज बचाई। मीरा ने पति माना। तो उन्हें पति रूप में मिले। सुदामा ने मित्र माना। तो मित्र रूप में मिले।
यदि उसकी कृपा और प्रेम पाना है। तो यह पहल तो हमें ही करनी होगी। हम उसकी ओर एक कदम बढ़ाएंगे। तो वह खुद हमें अपनी और खींच लेगा। और इस भवसागर से पार लगा देगा। हमें डूबने नहीं देगा। हमें एक तिनके के सहारे ही तार देगा।
इस बात पर एक बहुत ही सुंदर वाक्या मैं आपको बताती हूं। एक बार यशोदा मैया यमुना नदी में दीपदान करने जाती है। साथ में कान्हा जी को भी लेकर जाती है। यशोदा मैया एक पत्ते के ऊपर दीपक को रखकर यमुना नदी में बहाती हैं। दूसरी स्त्रियां भी इसी तरह पत्ते के ऊपर आटे से बने दीपक को रखकर नदी के पानी में बहाती हैं। तो कान्हा जी यह सब देख रहे थे। और उन्होंने देखा कि कुछ दीपक तो पानी पर तैर रहे हैं। और कुछ डूब जा रहे हैं। यह देख कान्हा जी एक छोटी सी लकड़ी के सहारे कुछ दीपक को अपनी ओर खींच कर किनारे लगाने लगते हैं। कान्हा जी को यह सब करते देख यशोदा मैया पूछती है।
कान्हा तू यह क्या कर रहा है? तो कान्हा जी कहते हैं। मैया यह दीपक डूब रहे थे। तो मैं इन्हे डूबने से बचा रहा हूं। और किनारे लगा रहा हूं। यह सुन यशोदा मैया मुस्कुराती है और कहती है। कान्हा यहां तो कितने सारे दीपक है। और तू किस-किस को डूबने से बचाएगा। तो कान्हा जी बोलते हैं। कि मैया मैंने सब का ठेका थोड़े ही ले रखा है। जो सबको डूबने से बचाऊंगा। जो मेरे पास आएगा। जो मेरे समीप आएगा। उसी को डूबने से बचाऊंगा। और जो मुझसे दूर जाएगा। वह तो डूबेगा ही।
जब हम उसके प्रेम में डूबते हैं। तो इस भव सागर में डूबने से बच जाते हैं।
तो डूबने से बचना है। तो उसके समीप जाइए। फिर हमारा ठेका वह ले लेगा। और हमें डूबने नहीं देगा। तार देगा। तो प्रेम से बोलिए राधे - राधे।
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