प्रस्तावना - इस लेख के माध्यम से मैंने यह बताया है। कि गलत बर्ताव करना और गलत सहना दोनों ही गलत है। रिश्ता कोई भी हो। किसी को भी ये इजाज़त नहीं देना। की वो आपके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाए।
हरे कृष्णा दोस्तों,
आज मैं महाभारत काल की एक बहुत प्रचलित कहानी आप लोगों के साथ शेयर कर रही हूं। कहानी कुछ इस तरह है। कि गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को ज्ञान देने हेतु कौरवों में से दुर्योधन को और पांडवों में से अर्जुन को चुनते हैं। और दोनों को एक टास्क देते हैं। पहले दुर्योधन को आदेश दिया जाता है। कि तुम समीप के गांव में जाकर कल सुबह तक एक ऐसे व्यक्ति को खोज कर मेरे समक्ष लाओ। जिसमें एक भी बुराई ना हो।
दुर्योधन गुरु की आज्ञा मान गांव के लिए प्रस्थान करता है। रास्ते में उसे कुछ बच्चे मिलते हैं। तो वह आवाज लगाकर उनसे पूछता है। सुनो बच्चों क्या गांव जाने का यही रास्ता है? परंतु बच्चे अपने खेल में व्यस्त थे। इसलिए बच्चों का दुर्योधन की बात पर ध्यान ही नहीं जाता। और बच्चे उसे अनसुना कर देते हैं। तो दुर्योधन को इस बात पर बहुत क्रोध आ जाता है। और क्रोधवस वह एक बच्चे का हाथ जोर से पकड़ कर उस पर चिल्लाता है। क्यों बे! बहरा है क्या? कब से आवाज लगा रहा हूं। और पूछ रहा हूं। क्या गांव जाने का यही रास्ता है। बच्चा बोलता है। पहले हाथ छोड़ो फिर बताता हूं। जैसे ही दुर्योधन हाथ छोड़ता है। बच्चा यह कह कर भाग जाता है। कि जा खुद ढूंढ ले नहीं बताना और उसके सभी साथी भी उसके साथ भाग जाते हैं। दुर्योधन जैसे तैसे गांव पहुंचता है। चलते चलते उसे प्यास लगती है। उसकी नजर एक बूढ़ी अम्मा पर पड़ जाती है। जो कुए से पानी भर रही थी। वह बूढ़ी अम्मा से पानी मांगता है। परंतु उम्र के कारण उनकी सुनने की क्षमता कम होती है। और उसे सुनाई ही नहीं देता है। कि कोई उसके पीछे खड़ा है। और पानी मांग रहा है। दुर्योधन को फिर से क्रोध आ जाता है। और वह जोर से चिल्लाते हुए कहता है। ऐं बुढ़िया सुनाई नहीं दे रहा क्या? कब से पानी मांग रहा हूं। बूढ़ी अम्मा को भी क्रोध आ जाता है। और बोलती है। पीने के लिए पानी मांग रहे हो। या अपना दिया हुआ कर्ज वापस मांग रहे हो। जो ऐसे बात करते हो। जा नहीं देना पानी। खुद भर लें। और पी लें। और ऐसा कह कर, वह चली जाती है। सुबह से रात हो जाती है। पर दुर्योधन के ऐसे व्यवहार के कारण, उसे रात में भी किसी भी घर में आश्रय नहीं मिलता। और ना ही भोजन। लोग यह कह कर मना कर देते हैं। कि तुम सज्जन व्यक्ति प्रतीत नहीं होते हो। हमारे घर में बहू बेटियां हैं। हम तुम्हें अपने घर में आश्रय नहीं दे सकते। तुम बाहर बरामदे में सो जाओ। दुर्योधन सुबह आश्रम लौट आता है। और गुरु द्रोणाचार्य से कहता है। उस गांव में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है। जिसमें कोई भी बुराई ना हो। बच्चे से लेकर बूढ़े तक, आदमी और औरत, हर कोई बुरा है वहां पर। मैं आप का दिया हुआ कार्य पूरा नहीं कर पाया।
गुरु द्रोणाचार्य कहते हैं। कोई बात नहीं। अब वो अर्जुन को कहते हैं। अर्जुन अब तुम जाओ। उसी गांव में और एक ऐसे व्यक्ति को खोज कर मेरे समक्ष प्रस्तुत करो। जिसमें कोई भी अच्छाई ना हो।
और अर्जुन गुरु की आज्ञा अनुसार गांव के लिए प्रस्थान करता है। रास्ते में वही बच्चे उसे खेलते हुए मिलते हैं। अर्जुन आवाज लगाता है। बच्चे अनसुना कर देते हैं। अर्जुन पास जाकर एक बच्चे के सर पर हाथ फेरकर कहता है। आप के खेल में व्यवधान डालने के लिए क्षमा चाहता हूं। पर क्या आप मुझे इस गांव का रास्ता बता सकते हैं। बच्चे बोलते हैं। हम इसी गांव के रहने वाले हैं। चलिए हम आपको मार्ग बतला देते हैं। वैसे भी हमारा घर लौटने का समय हो गया है। अर्जुन बिना भटके गांव पहुंच जाता है। चलते चलते उसे भी प्यास लग जाती है। वह उसी कुए के समीप पहुंचता है। और बूढ़ी अम्मा से पानी पीने हेतु प्रेम पूर्वक आग्रह करता है। बूढ़ी अम्मा उसे पानी पिलाती हैं। और कहती है। बेटा बाहर से आए हुए लगते हो। काफी थके हुए भी लग रहे हो। पास में मेरा घर है। थोड़ा विश्राम कर लो। अर्जुन उनके घर चला जाता है। अम्मा अपनी बहू से कहती है। आश्रम से हमारे घर में एक सज्जन पुरुष अतिथि रूप में आए हैं। उनके भोजन और रात में रुकने की व्यवस्था कर दो। अर्जुन हर व्यक्ति से मिलकर सुबह तक आश्रम वापस आ जाता है। और गुरु द्रोणाचार्य से कहता है। गुरु जी मुझे गांव में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला। जिसमें कोई अच्छाई ना हो।
गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों को बताया। वही गांव था। वही लोग थे। परंतु एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था। जिसमें पूर्ण रूप से सिर्फ बुराइयां या सिर्फ अच्छाइयां हो। और यदि हम अपना व्यवहार प्रेम पूर्वक रखते हैं। तो सामने वाले व्यक्ति भी प्रेम पूर्वक ही आपसे पेश आएगा। और दुर्व्यवहार रखने पर सामने वाला व्यक्ति भी आपसे वैसा ही दुर्व्यवहार करेगा। और नीचे लिखा था। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है। कि
" हम अच्छे तो जग अच्छा"
यह कहानी मैंने अपने बचपन में पढ़ी थी। इसलिए इस कहानी का मेरे दिलों दिमाग पर बहुत गहरा असर हुआ। और यह बात मैंने अपने व्यवहार में उतार ली। सभी से आदर और प्रेम पूर्वक व्यवहार रखने की पूरी कोशिश की। परंतु इस कहानी से निकला यह अर्थ कि
" हम अच्छे तो जग अच्छा "
मेरे अनुभव में पूर्ण रूप से गलत साबित हुआ। क्योंकि मेरे अच्छे व्यवहार के बावजूद कई लोगों का व्यवहार मेरे प्रति बहुत ही गलत और दुख पहुंचाने वाला रहा। अपने अनुभव के आधार पर इस कहानी में छुपे अन्य अर्थों को भी मैंने ढूंढने की कोशिश की है। पहला हम अच्छे तो जग अच्छा है। ये बात पूर्णता: सत्य होती, तो पांडवों के अच्छे व्यवहार के बावजूद कौरवों का व्यवहार उनके प्रति गलत क्यों होता। हम अच्छा व्यवहार करेंगे तो सामने वाले का व्यवहार भी हमारे प्रति अच्छा ही रहेगा। इस बात की गारंटी नहीं है। परंतु हमारे अच्छा व्यवहार करने से सामने वाला भी अच्छा व्यवहार करेगा इसकी संभावना अधिक होती है। इसलिए हमें अच्छा व्यवहार करना चाहिए। परंतु यदि कोई हमारे साथ अनुचित व्यवहार करता है। तो इस दिशा में हमें उन गांव वालों की भूमिका में आ जाना चाहिए। और जैसे के साथ तैसे वाला व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि यदि हम गलत व्यवहार से सहते रहेंगे। तो दुर्योधन जैसे अहंकारी और क्रोधित लोग हमारे साथ और अधिक अनुचित व्यवहार करते रहेंगे। क्योंकि मेरी नजर मैं गलत करना और गलत सहना दोनों ही सही नहीं है। यदि आपका व्यवहार सामने वाले के प्रति अच्छा है। उसके बावजूद यदि सामने वाले का व्यवहार आपके प्रति अच्छा नहीं है। अपितु दुख पहुंचाने वाला है। ऐसे में आप उसे स्पष्ट शब्दों में समझा दे। कि हम आपके साथ ऐसा दुर्व्यवहार नहीं करते और यदि आप करोगे तो हम आपका ऐसा दुर्व्यवहार सहेंगे भी नहीं। सामने वाले को यह बात समझ आती है। तो अच्छी बात है। और यदि नहीं समझ आती। तो ऐसे में कोशिश करें। कि ऐसे लोगों से दूरी बना ले। किसी भी तरह का अच्छा या बुरा कैसा भी व्यवहार ही ना रखें। क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करोगे। तो वह व्यक्ति हमेशा आपको दुख पहुंचाता रहेगा। और जो लोग आपके आंसुओ की वजह बने उनसे दूर होना ही बेहतर है। ये कलयुग हैं साहब। जितना आप गलत सहोगे । उतना ही लोग आपके साथ गलत करते चलें जायेंगे। आप ऐसे लोगों से जितना दबोंगे। उतना वे आपको दबाते चले जायेंगे। तो गलत के खिलाफ आवाज उठाना सीखे। यदि कोई आपके साथ गलत व्यवहार कर रहा है। तो उसका विरोध करना सीखें। और बता दें। कि आपका यह व्यवहार मुझे मान्य नहीं। दोस्तों इतना कहकर में अपनी बात को विराम देती हूं।
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