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बुधवार, 29 सितंबर 2021

क्या आप जानना चाहते हैं? परमात्मा कैसा है?

प्रस्तावना -  "क्या आप जानना चाहते हैं? परमात्मा कैसा है?" इस लेख में परमात्मा को लेकर जो भी संशय लोगों के मन में रहता है। उसे स्पष्ट किया गया है। कृपया लेख को पूरा पढ़े। ताकि आपके मन में भी परमात्मा को लेकर जो भी अनसुलझे प्रश्न है। वे सुलझ जाए।

















हरे कृष्णा दोस्तों,


दोस्तों मेरे बचपन की एक बात आज अचानक मुझे याद आ गई। हुआ यूं था कि मम्मी ने मुझे मंदिर में भगवान को हलवे का भोग लगाने के लिए दिया। मैंने गरम-गरम हलवे का भोग मंदिर में जैसे ही रखा। मम्मी ने मुझे कहा। अरे! इतने गर्म हलवे का भोग नहीं लगाते। भगवान का मुंह जल जाएगा। हलवे को थोड़ा ठंडा तो होने दे। मम्मी का इतना कहना था। कि मेरे मन में प्रश्न उठा। कि जो भगवान सूरज को भी मुंह में निगलने की क्षमता रखते हैं। भला उनका मुंह कैसे जल सकता है?



मंदिरों में भी मैंने देखा ठंड के समय में भगवान की प्रतिमा को ऊनी वस्त्र पहनाए जाते हैं। कि उन्हें ठंड लग जाएगी। यह देखकर फिर मन में प्रश्न हुआ। कि जो बर्फ के पहाड़ों पर विराजमान है। ठंडे पानी में कई माह तक रहते हैं। भला उन्हें ठंड कैसे लग सकती है?











दोनों ही धारणाएं एक दूसरे के विपरीत थी। एक और भगवान को इतना शक्तिशाली बताया। कि वह सूरज को भी निगल गए। अग्नि, वायु, जल किसी का भी बुरा प्रभाव उन पर नहीं पड़ता। तो दूसरी और उनको हम इंसानों जैसा माना गया। जिसमें उनकी प्रतिमाओं को ठंड के दिनों में ऊनी वस्त्र पहनाए जाते हैं। तो गर्मी के दिनों में उनके लिए पंखे कूलर आदि की व्यवस्था की जाती है। आखिर किस धारणा पर विश्वास करें? कि परमात्मा हम इंसानों जैसे कमजोर हैं। या शक्तिशाली। परमात्मा निराकार है। कि साकार है। परमात्मा एक है। कि अनेक है। आखिर परमात्मा कैसा है? बचपन में तो इन सवालों के जवाब नहीं मिले। पर बड़े होने पर आत्मज्ञान होने पर ऐसे ही कितने अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर खुद ही मिलना शुरू हो गए। और कुछ के अभी भी मिलना बाकी है। 


बचपन में सुना था। हम सब को भगवान ने ही बनाया है। यह पूरी दुनिया उसी की बनाई कृति है। यह बात तो सत्य है। इसमें कहीं कोई संशय नहीं है। लेकिन यदि मैं यह कहूं। कि "भगवान को हमने बनाया है।" तो आप विश्वास करेंगे। नहीं ना। पर मैं यह बात ऐसे ही नहीं कह रही हूं। यह बात भी पुर्णत: सत्य हैं। कि एक भक्त ही अपने भगवान को बनाता है। क्योंकि भगवान का कोई रूप नहीं है। कोई आकार नहीं है। वह निराकार है। और भक्त अपनी कल्पना से जो रूप जो छवि अपने मन में भगवान के प्रति बनाता है। वह उसी रूप में उसके समक्ष साकार हो जाता है। जैसे पानी को जिस बर्तन में डालोगे। वह उसी का आकार ले लेगा। ठीक वैसे ही भक्तों की कल्पना और विश्वास भगवान को आकार दे देती है।



यदि एक भक्त विश्वास करता है। कि मेरे प्रभु का गरम हलवे से मुंह जल जाएगा। तो सच में उनका मुंह उस गरम हलवे से जल जाएगा। क्योंकि भगवान तो भक्तों की भावनाओं का मान रखते हैं।



जैसा कि आपने रसखान के बारे में सुना होगा। 1558 ईस्बी. दिल्ली में इनका जन्म हुआ था। यह एक मुसलमान परिवार से थे। सैयद इब्राहिम खान इनका नाम था। जो बाद में भगवान कृष्ण की कृपा से रसखान नाम से प्रचलित हुए।












हुआ यूं। कि एक दिन खान साहब पान खाने पान वाले की दुकान पर जाते हैं। तभी उनकी नजरें दुकान पर लगी बाल रूप कृष्ण की छवि पर पड़ती है। और उस छवि को देखकर वे बहुत आनंदित हो जाते हैं। और कहते हैं। वाह! इस बालक का कितना मनमोहक रूप है। और वे उस पान वाले से पूछते हैं। भाई यह बालक कौन है। इसका कितना सुंदर रूप है। और कितना कोमल बदन है। और यह इस पथरीली और खुरदरी जमीन पर नंगे पांव खड़ा है। इसके घर वालों ने इसे जूतियां भी नहीं पहनाई है। इसके इन कोमल पांव में यह खुरदरी जमीन और कांटे  चुभते होंगे। पान वाला मजाक में कह देता है। भाई तुम्हें इतनी फिक्र हो रही है। इस बालक की। तो तुम ही क्यों नहीं इसको जूतियां ला देते? 


खान साहब कहते हैं। ठीक कह रहे हो। मैं ही इसके लिए जूतियां ले आता हूं। और वह दूसरे दिन पान वाले की दुकान पर जूतियां लेकर पहुंच जाते हैं। और कहते भाई यह जूतियां लेकर आया हूं। आप इस बालक तक पहुंचा देना। तो पान वाला कहता है। भाई यह बालक यहां नहीं रहता। जो इसको जूतियां दे आऊ। मैं अपना काम धंधा छोड़कर कहीं नहीं जा रहा। तुम ही चले जाओ। 



ठीक है। भाई, मैं ही दे आऊंगा। पर तुम मुझे इतना तो बता दो। कि इस बालक का नाम क्या है? और यह कहां रहता है? पानवाला कहता है। भाई इस बालक का नाम श्याम है। और यह वृंदावन में रहता है। और खान साहब पूछते हैं। कि भाई सही सही पता तो बता दो। कि कहां मिलेगा श्याम? वृंदावन तो इतना बड़ा है। पानवाला कहता है। वहां किसी से भी पूछोगे। तो हर कोई बता देगा। कि श्याम कहां मिलेगा? खान साहब वृंदावन जाते हैं। और रास्ते में मिलने वाले हर व्यक्ति से पूछते हैं। कि बताओ कहां मिलेगा श्याम? और एक सज्जन पुरुष को श्याम के रुप का वर्णन करते हुए पूछते हैं। एक नन्हा सा बालक है। सावली सी सूरतिया है। नैन कजरारे उसके। बाल घुंघराले उसके। पहनता मोर मुकुट है। पांव में पैजनिया है। और उसका नाम श्याम है क्या तुम ऐसे किसी बालक को जानते हो वह व्यक्ति बोलता है। भाई जैसा रूप  तुम बता रहे हो। वह तो बांके बिहारी है। वह इसी नाम से जाना जाता है यहां पर। उसके और भी कई नाम है। कोई उसे मोहन, कोई उसे कान्हा, कोई उसे बांके बिहारी, कोई उसे कृष्णा तो कोई उसे श्याम कहता है। चलो मैं आपको उसके पास ले चलता हूं। और वह व्यक्ति खान साहब को बांके बिहारी के मंदिर पर छोड़ देता है। और कहता है। जिस श्याम को तुम ढूंढ रहे हो। वह यहीं रहता है। जाओ मिल लो उससे। परंतु मंदिर का पुजारी खान साहब को मंदिर के अंदर मुसलमान होने के कारण प्रवेश नहीं देता। तो खान साहब मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर ही श्याम का इंतजार करने लगते हैं। और सोचते हैं। कि श्याम कभी तो घर से बाहर निकलेगा खेलने के लिए। मैं यह जूतियां उसे तभी पहना दूंगा। इंतजार में पूरा दिन बीत जाता है। पूरी रात बीत जाती है। फिर से भोर होने को आ जाती है। पर खान साहब भूखे प्यासे इस आस में कि मैं श्याम को जूतियां पहनाए बिना कहीं नहीं जाऊंगा। और श्याम के इंतजार में वहां पर बैठे रहते हैं। 



तभी बालरूप कृष्ण, खान साहब के समक्ष उसी रूप में आते हैं। जो रूप खान साहब ने पान वाले की दुकान पर देखा था। और खान साहब श्याम को देखते ही पहचान लेते हैं। और खुशी से फूले नहीं समाते। शाम को गले लगा लेते हैं। और कहते हैं। देखो मैं तुम्हारे लिए जूतियां लाया हूं। श्याम कहते हैं। तुम ही पहना दो मुझे यह जूतियां इसी के लिए तो मैं इतनी दूर से आया हूं। जैसे ही खान साहब जूतिया पहनाने के लिए श्याम के पैरों की तरफ देखते हैं। तो चौक जाते हैं। क्योंकि श्याम के पैर खुरदरी जमीन और कांटो से घायल थे। और लहूलुहान हो रहे थे। यह देखकर खान साहब कहते हैं। देखा इसी बात का डर था मुझे कि कहीं तुम्हारे पैर ना घायल हो जाए। तुम मुझे बुला लेते। तो मैं आ जाता तुम्हारे पास। तो तुम्हारे पैर इस तरह घायल नहीं होते। इस बात पर श्याम, खान साहब को हाथ पकड़कर मंदिर के अंदर ले जाते हैं। और अपना बांके बिहारी का रूप दिखाते हैं। और पूछते हैं?


देखो यदि मैं तुम्हें अंदर बुला लेता। तो क्या इस रूप में तुम मुझे पहचान पाते। नहीं ना। इसलिए मैं उसी रूप में तुम्हारे समक्ष आया हूं। जिस रूप को हृदय में बसाकर तुम मुझसे मिलने आए हो। और तुम्हारे हृदय में मेरे प्रति यह भाव थे। कि इस खुरदरी जमी से और कांटों से मेरे पांव घायल हो जाएंगे। इसलिए ही मेरे पांव घायल हो गए। क्योंकि तुम्हारे भाव का मान तो मुझे रखना ही था।



इस घटना के बाद से खान साहब ने अपना जीवन श्याम भक्ति में लीन कर दिया। और श्याम के कई सुंदर-सुंदर पद लिखे। और खान से रसखान बन गए। और इसी नाम से प्रचलित हुए। इस कहानी के माध्यम से मैंने यह बताया है। कि भगवान वैसा ही रूप ले लेते हैं। जैसा उनके भक्तों का भाव होता है। जैसी उनके भक्तों की कल्पना या विश्वास होता है। तो यहां पर आपको यह तय करना है। कि आपको अपने भगवान को कैसा रूप देना है?


यह मानना है कि गर्म हलवे से उनका मुंह जल जाएगा। या फिर यह विश्वास करना है। कि आपके प्रभु तो इतने शक्तिशाली हैं। कि सूरज को भी मुंह में आसानी से निगल सकते हैं।



यह मानना है कि पूजा पाठ में आपसे कुछ गलतियां हो जाती है। तो वह आपसे रुष्ट हो जाएंगे। और आपको उसका दंड देंगे।


या फिर यह मानना है। कि मेरे प्रभु तो दयावान है। करुणावान है। और कुछ गलती मुझसे यदि हो जाती है। तो वे अपना बच्चा जान मुस्कुरा कर मुझे मेरी गलतियों के लिए माफ कर देंगे।


कोई मुझसे पूछे कि परमात्मा कैसा है? अथार्थ भगवान् कैसे हैं? कैसे दिखते हैं? तो मैं तो यही कहूंगी। कि जैसी आपकी धारणा है। जैसा आपका विश्वास है। आपके भगवान भी वैसे ही हैं।


तो जो भी धारणा बनाएं। अपने भगवान के लिए। वह सोच समझकर ही बनाएं। क्योंकि आपके भगवान आपके विश्वास पर 100% खरे उतरते हैं। और आपके भाव का मान रखते हैं। तो प्रेम से बोलिए राधे राधे।



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