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बुधवार, 23 जून 2021

जानें परमात्मा हैं या नहीं ? उनके होने का प्रमाण

हरे कृष्णा दोस्तों,


दोस्तों दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं। जो परमात्मा को नहीं मानते। उसके अस्तित्व को नकार देते हैं। ऐसे ही कुछ लोगों से मेरी बात हुई उनसे पूछा कि आप परमात्मा को क्यों नहीं मानते। तो उनका कहना था। कि हमने कभी उसको देखा ही नहीं अगर कोई चीज होती है। तो दिखाई देती है। परमात्मा होते तो दिखाई देते। तो मैंने कहा कि दिखाई तो हवा भी नहीं देती। तो क्या आप उसके अस्तित्व को भी नकार दोगे? तो वे बोले हवा दिखाई नहीं देती परंतु feel तो होती है ना।


दोस्तों इस बात पर मैं बोलना चाहती हूं। कि यदि आपने परमात्मा को देखा नहीं है। या अनुभव नहीं किया है। तो वास्तविकता यह नहीं है कि परमात्मा नहीं है। बल्कि आपके लिए वास्तविकता यह है। कि आपको पता नहीं है। कि परमात्मा है या नहीं।


क्योंकि सच को बिना जाने, बिना समझे, बिना सच की खोज किए आप उसके अस्तित्व को नकार नहीं सकते। जैसे कि आपने अपने परदादा के परदादा को कभी नहीं देखा और ना ही कभी महसूस किया। तो क्या आप यह कहोगे? कि वह थे ही नहीं। क्या उनके अस्तित्व पर सवाल खड़े कर सकते हो? नहीं ना। क्योंकि उसका सबसे बड़ा प्रमाण आप हो और आपका होना ही उनके अस्तित्व का प्रमाण है। क्योंकि यदि आप के परदादा नहीं होते, तो आपके दादा नहीं होते, और आपके दादा नहीं होते, तो आपके पिता नहीं होते, और आपके पिता नहीं होते, तो आप नहीं होते। और आपका होना ही उनके अस्तित्व का प्रमाण हैं। बल्कि मैं तो यही कहूंगी कि आप के परदादा का अस्तित्व था ही नहीं बल्कि अभी भी है। क्योंकि आप के परदादा का शरीर नष्ट हुआ था। उनकी आत्मा नहीं। उनकी आत्मा तो आज भी किसी ना किसी रूप में अस्तित्व में होगी ही। जिस तरह हमारा भौतिक शरीर जन्म लेता है। तो हमारे माता-पिता का होना प्रमाणित है। कोई भी यह साबित नहीं कर सकता कि मैंने बिना माता-पिता के ही जन्म लिया। मैं किसी माचिस की डिब्बी में से पैदा हुआ।


जैसे हमारा भौतिक शरीर हमारे माता-पिता के कारण ही अस्तित्व में आता है। वैसे ही हमारा सूक्ष्म शरीर हमारी आत्मा परमात्मा के कारण ही अस्तित्व में आई है। आत्मा परमात्मा का ही अंश है। उसी से उसका जन्म हुआ है। तभी तो उसे परमपिता परमात्मा के नाम से संबोधित किया जाता है। जिस तरह हमारा भौतिक शरीर का होना ही हमारे भौतिक माता-पिता के अस्तित्व को प्रमाणित करता है। ठीक उसी तरह हमारे शरीर के भीतर हमारी आत्मा का होना ही परमात्मा के अस्तित्व को प्रमाणित करता है।



और ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। कि हम परमात्मा को देख नहीं सकते या अनुभव नहीं कर सकते। बिल्कुल कर सकते हैं। जैसा कि wifi हर जगह मौजूद होता है। पर दिखाई नहीं देता। उसे छू नहीं सकते। पर सही पासवर्ड डालने पर उसके संकेत को देख सकते हैं। महसूस कर सकते हैं, कि बिना नेट बैलेंस के भी हमारा मोबाइल चल रहा है। परंतु wrong password डालने पर आपका मोबाइल WIFI से कनेक्ट नहीं होता है।



जिस तरह एक wrong password आपको वाईफाई से कनेक्ट नहीं कर सकता ठीक उसी तरह wrong password आपको परमात्मा से कैसे कनेक्ट कर सकता है? और हम यही गलती करते आ रहे हैं। हर बार wrong password  डालते हैं। और इसी वजह से परमात्मा से कनेक्ट नहीं हो पाते । और फिर मान लेते हैं। कि परमात्मा तो है ही नहीं।








परमात्मा के समीप जाने का रास्ता बाहर कहीं नहीं है। आपके भीतर ही है। आपके हृदय से होकर ही गुजरता है। और जब आप हृदय से होकर अपनी अंतरात्मा तक पहुंचते हैं। तो परमात्मा स्वयं आप तक पहुंच जाता है। उस से कनेक्ट होने का सही पासवर्ड आज मैं आपको बताती हूं।

वह है - उसके प्रति 


अटूट विश्वास, निस्वार्थ प्रेम और समर्पण।



जब यह पासवर्ड आप अपने हृदय में डालोगे तो आपका उससे कनेक्ट होना 100% तय हैं। और उसकी मौजूदगी का अनुभव आपको उसी तरह होता हैं। जैसे तपती धूप के बीच में आपको हरे भरे पेड़ के नीचे छाया, शीतल हवा और सुकून अनुभव होता है। जिस तरह उसे अनुभव किया जा सकता है। उसी तरह उसे स्पष्ट रूप से देखा भी जा सकता है। परंतु हमारी यह दो आंखें उसे देखने में सक्षम नहीं है।



जैसे कि कोरोनावायरस को हम अपनी आंखों से नहीं देख सकते। उसे स्पष्ट रूप से देखने के लिए हमें एक माइक्रोस्कोप की जरूरत पड़ेगी। परंतु माइक्रोस्कोप से ग्रहों को नहीं देखा जा सकता। उसे देखने के लिए टेलिस्कोप की जरूरत होती है। अतः जिन चीजों को हमारी आंखें देखने में सक्षम नहीं है। उन्हें देखने के लिए एक विशेष प्रकार के tools की आवश्यकता होती है। जिस तरह माइक्रोस्कोप से ग्रहों को और टेलिस्कोप से वायरस को नहीं देखा जा सकता। उसी तरह किसी माइक्रोस्कोप या टेलिस्कोप से भगवान को नहीं देखा जा सकता। भगवान को देखने के लिए भी विशेष प्रकार के tools की जरूरत होती है।और वह tool है -


 " भक्त का मन " जिसे साइंटिस्ट इजात नहीं कर सकते। इसलिए आज तक साइंस भगवान तक नहीं पहुंच पाया है। लेकिन एक भक्त अपने भक्तिमय मन के सहारे भगवान तक आसानी से पहुंच जाता है।



इस बात को सिद्ध करते हुए। सूरदास जी के जीवन का एक बहुत ही सुंदर वाक्या मैं आपको सुनाती हूं। 


दोस्तों आप सभी जानते हैं। सूरदास जी जन्म से अंधे थे। और उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं देता था। और सूरदास जी भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। कहा जाता है। सूरदास जी जब भजन गाते थे तो उनके भजन सुनने स्वयं भगवान श्री कृष्ण सूरदास जी के सामने बैठ कर उनके भजन सुनते थे।








एक बार सूरदास जी मंदिर के पुजारी से कहते हैं। वाह वाह आज मेरे प्रभु पीले वस्त्रों में कितने सुंदर लग रहे हैं! तो पुजारी यह सुनकर चौंक जाता है। कि यह तो अंधा है। और इसे कैसे दिखा कि आज मैंने भगवान की मूर्ति को पीले वस्त्र पहनाए हैं। पुजारी दूसरे दिन फिर पूछता है। कि बता आज तेरे भगवान ने किस रंग के वस्त्र धारण किए है? सूरदास जी कहते हैं। वाह आज तो नीले वस्त्र पहने हैं। कितने सुंदर दिख रहे हैं। मेरे प्रभु इन वस्त्रों में। पुजारी हर दिन पूछता और सूरदास जी हर दिन बता देते कि मेरे प्रभु ने किस रंग के वस्त्र धारण किए हैं। पुजारी सोचता है। यह शायद मन से ही कोई रंग बता देता है। और संयोगवश वह मेल खा जाता है। एक दिन पुजारी मूर्ति को कोई वस्त्र ही नहीं पहनाता और सूरदास जी से पूछता हैं। बता आज तेरे प्रभु ने किस रंग के वस्त्र धारण किए हैं। सूरदास जी हंसते हुए बोलते हैं। " क्या मेरे प्रभु ऐसी नौबत आ गई। कि आज वस्त्र ही नहीं मिले धारण करने के लिए। " पुजारी को यह सुन शक होता है। कि हो ना हो सूरदास जी को थोड़ा-थोड़ा दिखाई देता है। और यह लोगों को बेवकूफ बनाता है। कि उसे दिखाई नहीं देता। और पुजारी एक योजना बनाता है। कि सच क्या है? वह सामने आ जाएगा। वह सूरदास जी के आने जाने वाले रास्ते में बीचोबीच एक बड़ा सा गड्ढा करवा देता है। और कहता है। देखो यदि वह अंधा हुआ। तो इस खड्डे में गिर जाएगा। और यदि उसे दिखता होगा तो वह सीधे ना जाकर किनारे से इस गड्ढे से बचता हुआ निकल जाएगा। सूरदास जी आते हैं। और अंधे होने के कारण उन्हें वह खड्डा दिखाई नहीं देता। और वे उस खड्डे में गिर जाते हैं। और जब चाहकर भी उस खड्डे से निकल नहीं पाते तो हृदय से अपने प्रभु को पुकारते हैं। क्योंकि एक भक्त तो मुसीबत पड़ने पर किसी और से सहायता की पुकार ना लगाकर, अपने भगवान को ही बुलाता है। और भगवान श्री कृष्ण एक बालक का रूप धारण कर उन्हें बचाने आ जाते हैं। जो दूसरों को एक साधारण बालक नजर आ रहा था। वही बालक सूरदास जी को बाल रूप कृष्ण नजर आ रहे थे। और वे अपने प्रभु को पहचान लेते हैं। और जब वह हाथ पकड़कर सूरदास जी को बाहर निकालते हैं। तो सूरदास जी उस बालक का हाथ ही नहीं छोड़ते।


कौन भक्त अपने भगवान का हाथ छोड़ना चाहेगा? उस दिव्य अनुभूति को त्यागना चाहेगा? परंतु लोगों के सामने कहीं सच ना आ जाए कि वह बालक स्वयं भगवान श्री कृष्ण है तो वह जबरदस्ती सूरदास जी से अपना हाथ छुड़ा कर भाग जाते हैं। इस बात पर उनका एक बहुत ही सुंदर दोहा हमें मिलता है।



हाथ छुड़ाये जात हो, निर्मल जानि के मोय।

हृदय से  जाओ, तो सबल जानूंगा तोय।।


अर्थात हाथ छुड़ाकर तो चले गए। निर्बल जानकर मुझे। परंतु मेरे हृदय से जाकर बताओ। तो तुम्हें सबल जानूंगा।


दोस्तों सूरदास जी जन्म से अंधे थे। उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता था। परंतु अपने प्रभु स्पष्ट रूप से दिखाई देते थे। क्योंकि भगवान को देखने वाला विशेष tool वह "भक्तिमय मन" उनके पास था। तो भगवान को तो "भक्तिमय मन की आंखों" से हीं देखा जा सकता है।


तो प्रेम से बोलिए राधे राधे


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