प्रस्तावना - " सिर्फ़ एक प्रण लें और मां के हर रूप की कृपा आप पर बरसेगी। " इस लेख में मैने बताया है। कि आप किस तरह मां की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। और सही मायने में नवरात्रि का मतलब क्या होता हैं। उसके पीछे क्या संदेश छुपा हुआ है।
हरे कृष्णा दोस्तों,
दोस्तों अभी कुछ दिनों बाद नवरात्रि का त्यौहार आने वाला है। भारत के लगभग हर हिंदू परिवार में यह पावन पर्व मनाया जाता है। जिसमें 9 दिनों तक देवी मां के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। बड़े ही श्रद्धा भक्ति के साथ यह 9 दिनों का पर्व मनाया जाता है। और कन्या भोज कराया जाता है। यहां पर मैं आपको नवरात्रि की पूजन विधि नहीं बता रही हूं। यह जानकारी तो आपको कई यूट्यूब चैनल पर मिल जाएगी। इस लेख को लिखने का मेरा उद्देश्य है। कि आप हमारे सनातन धर्म में मनाए जाने वाले उत्सव, तीज त्यौहारों और प्रथाओं में छुपे हुए सकारात्मक पहलू को जान सके। ताकि हमारा समाज एक सकारात्मक दिशा की ओर आगे बढ़ सके।
हमारे सनातन धर्म पर हमें गर्व है। क्योंकि यह हमें स्त्रियों का सम्मान करना सिखाता है। उसे पूजनीय और वंदनीय दर्शाता है। जब वह बाल रूप में होती है। तो नवरात्रों में कन्या के रूप में पूजा जाता है। जब माता-पिता अपनी पुत्री का विवाह किसी के साथ करते हैं। तो कन्यादान किया जाता है। जिसे हमारे शास्त्रों में महादान माना गया है। जब स्त्री ससुराल में अपना पहला कदम रखती है। तो उसे लक्ष्मी स्वरूप मान कुमकुम से पैरों के छाप लगवाए जाते हैं। और पूजा की थाली में दीपक रख उसकी आरती की जाती है। और गृह लक्ष्मी का दर्जा दिया जाता है। हमारे सनातन धर्म के अनुसार जो भी प्रथाएं प्रचलित हैं। उनमें सदा स्त्री सम्माननीय और पूजनीय रही है।
हमारे जो भी इष्ट हैं। प्रभु हैं। उनके नाम के पहले हमेशा हमारी देवी मां का नाम जोड़ा जाता है। जैसे- सियाराम या सीताराम, गौरीशंकर, राधाकृष्ण, लक्ष्मी नारायण आदि। अतः पुर्ण रूप से स्पष्ट है। कि हमारा सनातन धर्म हमेशा स्त्रियों को सम्मानीय पूजनीय और पुरुष से पहले स्त्री को स्थान देने की ओर संकेत करता है।
परंतु दुर्भाग्यवश भारत के कई घरों में इसके उलट स्त्री की बहुत दयनीय स्थिति मिलती है। सम्मान देना तो बहुत दूर की बात है। उन्हें पुरुष के बराबर का दर्जा भी नहीं दिया जाता है। और छोटी सोच के चलते हमेशा नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता है। कई घरों में स्त्री को गाली देना, ताने देना, उनके साथ मारपीट करना, गलत व्यवहार करना, शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना आदि। गलत कार्य किए जाते हैं।
जिस देश में एक और कन्या पूजन जैसी प्रथा है। उसी देश में आज भी चोरी छुपे कन्या भ्रूण को पेट के भीतर या जन्म लेते ही मार दिया जाता है। वहीं दूसरी तरफ छल से या झूठे प्यार का नाटक कर उसकी इज्जत के साथ खेला जाता है। या फिर ज़ोर जबरजस्ती कर बलात्कार जैसे घिनौने कार्य को अंजाम दिया जाता है। यह हमारे लिए बहुत शर्म की बात है।
धार्मिक होने का मतलब सिर्फ माताजी के बड़े-बड़े पंडाल लगाना नहीं है। कन्या को भोजन कराना नहीं है। धार्मिकता तो आचरण में होनी चाहिए। जहां स्त्री को देवी स्वरूप मान उसका सम्मान करना चाहिए। जिस दिन लोगों ने धर्म का असली मतलब समझ लिया। और उसे अपने आचरण में उतार लिया। उस दिन किसी पुरुष के मुंह से मां बहन की गाली तक नहीं निकल सकती।
इसलिए मेरा सभी से निवेदन है। कि धर्म को सिर्फ तीज त्योहारों के रूप में ना मनाया जाए। उसके पीछे छुपे हुए असली मतलब को भी समझा जाए। और उसे अपने आचरण में उतार देश और समाज को गौरवान्वित करने वाले कार्य किए जाएं।
जो लोग धर्म में छुपे हुए उसके असली मतलब को नहीं जानते। और धर्म से विमुख हो जाते हैं। वह लोग ऐसे कार्य करते हैं। जो हमारे देश समाज और इंसानियत को शर्मसार करते हैं।
पौराणिक मान्यता है। जिस घर में स्त्री हंसती मुस्कुराती रहती है। उस घर में लक्ष्मी का वास होता है। और जिस घर में आपके गलत व्यवहार के कारण वह रोती है। उस घर से लक्ष्मी रुष्ट होकर चली जाती है। इतिहास गवाह है। जहां स्त्री का अपमान किया जाता है। वहां हस्तिनापुर जैसा इतना बड़ा साम्राज्य तक नष्ट हो जाता है। दोस्तों मेरे कहने पर इस नवरात्रि सिर्फ यह प्रण लें। कि घर और घर के बाहर हर आयु वर्ग की स्त्री का आप सम्मान करेंगे। यकीं मानिए आपके ऊपर लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती "मां" के हर रूप की कृपा बरसेगी।
अतः इस साल के नवरात्रों में सिर्फ कन्या पूजन नहीं बल्कि हर बहन बेटी चाहे वह अपने घर की हो या दूसरों के घर की उस को सम्मान देने का वचन ले और अपने धर्म की मर्यादा का पालन करें।
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